Lalluram Desk. महाभारत के कुरुक्षेत्र की पहचान केवल एक युद्ध के मैदान की नहीं रही बल्कि यह हमेशा हमारी पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक आस्थाओं का केंद्र रहा है। महाभारत काल से जुड़े अनेकों प्रमुख पौराणिक तथ्य आज भी यहां मौजूद है। क्या सच में महाभारत के युद्ध के बाद आज भी कुरुक्षेत्र की मिट्टी लाल है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं।

हजारों साल पहले द्वापर युग में जिस कुरुक्षेत्र के मैदान पर कौरवों और पांडवों का महायुद्ध हुआ आज हम आपके साथ उसी युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र के बारे में कुछ ऐसी रोचक जानकारी साझा करने वाले है। आइए जानते है अनगिनत योद्धाओं के खून से रंगी कैसी है यहां की मिट्टी और क्या खास है यहां देखने लायक।

कोई बिरला ही होगा जिसने अपने बड़े बुजुर्गों या फिर टीवी सीरियल से महाभारत के बारे में ना सुना हो। खासकर कौरवों और पांडवों के बीच कुरूक्षेत्र के मैदान पर लड़े गए भीषण महायुद्ध के बारे में। बल्कि इसको लेकर अक्सर लोगों के बीच बड़ी उत्सुकता बनी रहती है।18 दिन तक चले इस युद्ध में ना जाने कितने योद्धाओं और सैनिकों का खून बहाया गया। कहा जाता है कि युद्ध के दौरान चारों तरफ केवल लाशों के ढेर ही ढेर नजर आते थे। इस युद्ध में कुल 18 अक्षौहिणी सेना ने भाग लिया था, जिसमें कौरवों की ओर से 11 और पांडवों की ओर से 7 अक्षौहिणी सेना थी। एक अनुमान के अनुसार, इस युद्ध में करोड़ों योद्धा मारे गए थे। खून से मिट्टी लाल हो चुकी थी।

महाभारत का युद्ध केवल एक लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच लड़ा गया महासंग्राम था। इसी युद्ध के मैदान पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया जिसे आज भी जीवन का सार माना जाता है। यहां की धरती को पावन और पवित्र माना जाता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में अनेक स्थानो पर इसका वर्णन मिलता है। यहां की पौराणिक नदी सरस्वती का भी अत्यन्त महत्व है। सरस्वती एक पौराणिक नदी है जिसकी चर्चा वेदों में भी है।

कुरुक्षेत्र की पौराणिक सीमा 48 कोस की मानी गई है। वन पर्व में बताया गया है कि कुरुक्षेत्र के सभी लोग पापमुक्त हो जाते हैं और वह भी जो सदा ऐसा कहता है- कि ‘मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा और वहाँ रहूँगा।’ मान्यताओं के अनुसार विश्व में इससे बढ़कर कोई अन्य पुनीत स्थल नहीं है। यहाँ तक कि यहाँ की उड़ी हुई धूलि के कण पापी को परम पद देते हैं।’ यहाँ तक कि गंगा की भी तुलना कुरुक्षेत्र से की गयी है। नारदीय पुराण में कहा गया है कि ग्रहों, नक्षत्रों और तारा मंडल को आकाश से नीचे गिरने का भय हो सकता है परन्तु कुरुक्षेत्र में मरने वालों को पुन: पृथ्वी पर गिरने का डर नहीं होता। अर्थात कुरुक्षेत्र मे देह त्यागने वाले को दोबारा पृथ्वी पर जन्म लेने से मुक्ति मिल जाती है।

अब सवाल ये है कि हजारों साल पहले जिस भूमि पर उस समय का सबसे विनाशकारी युद्ध लड़ा गया आज वह भूमि कहां है और कैसी है। क्या आज भी वहां उस लड़ाई या उस महाभारतकालीन समय के कोई पौराणिक साक्ष्य मौजूद है। वहां की रक्तरंजित भूमि क्या आज भी लाल है।

बता दें कि यह स्थान हरियाणा में स्थित है। जो आज भी कुरुक्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह हरियाणा का एक बड़ा शहर है जो जिला मुख्यालय भी है। दिल्ली चंडीगढ़ नेशनल हाइवे पर स्थित यह शहर सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा है। दिल्ली और चंडीगढ़ यहां से नजदीकी हवाई अड्डे है। यहां आज भी बहुत से महाभारत कालीन पवित्र एवं धार्मिक स्थल मौजूद है।

ब्रह्म सरोवर : ब्रह्मांड उत्पत्ति स्थल

यह एशिया के सबसे बड़े मानव निर्मित सरोवरों में से एक है। जिसकी लंबाई 3600 फीट और चौड़ाई 1500 फीट है। मान्यताओं के अनुसार भगवान ब्रह्म ने यहां एक यज्ञ किया था और यही से ब्रह्मांड की रचना की शुरुआत की थी। महाभारत युद्ध में दुर्योधन ने खुद को भीम से बचाने के लिए इसी सरोवर में पानी के नीचे छिपने का प्रयास किया था। युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात राजा युधिष्ठिर ने सरोवर के बीच में विजय स्तंभ स्थापित किया था। शास्त्रों में इसे आदि सरोवर कहा गया है। सरोवर के चारों ओर पक्के घाट बने हैं, जिनके नाम महाभारत के पात्रों जैसे अर्जुन घाट, भीम घाट, कृष्ण घाट और अभिमन्यु घाट पर रखे गए हैं।

सरोवर में सूर्य ग्रहण के अवसर पर स्नान करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और लाखों अश्वमेघ यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। प्रतिवर्ष नवंबर-दिसंबर में यहां गीता महोत्सव भी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान ‘दीप दान’ और भव्य आरती का आयोजन होता है, जिससे पूरा सरोवर जगमगा उठता है। यह कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से महज 3 किमी की दूरी पर स्थित है।

ज्योतिसर : गीता का उपदेश

यह महाभारत काल के पवित्र एवं धार्मिक स्थलों में से एक महत्वपूर्ण स्थल है। महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले श्रीकृष्ण ने मोहग्रस्त अर्जुन को इसी स्थान पर अपने विराट स्वरूप के दर्शन दिए थे। यहां आज भी एक अक्षय वट वृक्ष मौजूद है जिसे श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गीता उपदेश का साक्षी माना जाता है। हाल ही में यहां श्रीकृष्ण की 40 फीट ऊंची विशाल विराट स्वरूप प्रतिमा स्थापित की गई है।

इसके अलावा संगमरमर निर्मित भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथ की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। यह प्रतिमा उस दृश्य को दर्शाती है जब महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे और भगवान श्रीकृष्ण ने अपने विराट स्वरूप के दर्शन देकर उन्हें युद्ध के लिए तैयार किया था। हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा यहां प्रतिदिन संध्या काल में भव्य लाइट एंड साउंड शो आयोजित किया जाता है। यह शो महाभारत की घटनाओं और गीता के उपदेशों को रंगीन रोशनी और ध्वनि के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। ज्योतिसर पिहोवा मार्ग पर कुरुक्षेत्र से लगभग पांच किमी दूरी पर स्थित है।

श्रीकृष्ण संग्रहालय

यह भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और दर्शन को समर्पित एक अद्वितीय संग्रहालय है। महाभारत काल से जुड़ी कई वस्तुएं यहां आज भी संरक्षित रखी गई है। इसे 1987 में स्थापित किया गया था और वर्तमान में यह कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड द्वारा संचालित है। संग्रहालय में 6 मुख्य गैलरी हैं, जो दो ब्लॉकों में विभाजित हैं। एक ब्लॉक में कलाकृतियां जैसे हाथीदांत, लकड़ी और धातुओं से बनी मूर्तियां, नक्काशी एवं प्राचीन पांडुलिपियां प्रदर्शित की गई है।

दूसरे ब्लॉक में पुरातत्विक सामग्री जैसे खुदाई में मिली हड़प्पा और महाभारत कालीन वस्तुएं, मिट्टी के बर्तन और प्राचीन मूर्तियां रखी गई है। 2012 में यहां एक मल्टीमीडिया गैलरी बनाई गई है। जिसमें महाभारत और गीता के उपदेशों को आधुनिक तकनीक से दर्शाया गया है। यह संग्रहालय ब्रह्म सरोवर के पास और पैनोरमा एवं विज्ञान केंद्र के ठीक बगल में स्थित है। यह सुबह 10 से शाम शाम 5 बजे तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है।

पैनोरमा एवं विज्ञान केंद्र

यह एक अदभुत विज्ञान केंद्र है जहां आप एक विशाल बेलनाकार हॉल में महाभारत युद्ध के दृश्यों को 34 फीट ऊंचे चित्रों के माध्यम से देख सकते है। यहाँ युद्ध की आवाज़ें, शंखनाद और गीता के उपदेशों की ध्वनि एक वास्तविक युद्धक्षेत्र जैसा अनुभव कराती है। इसके अलावा यहां एक इंडिया: ए हेरिटेज इन साइंस, टेक्नोलॉजी एंड कल्चर नामक प्रदर्शनी भी है। इसमें प्राचीन भारत के खगोल विज्ञान, चिकित्सा, गणित (शून्य की अवधारणा), और धातु विज्ञान के योगदान को इंटरैक्टिव मॉडल के जरिए दिखाया गया है।

केंद्र के बाहरी परिसर में एक खुला पार्क है जहाँ बच्चे और बड़े खेल-खेल में विज्ञान के नियमों (जैसे ध्वनि, प्रकाश और गति) को समझ सकते हैं। बच्चों के लिए यहाँ विभिन्न प्रजातियों के डायनासोरों के आदमकद और चलने-फिरने वाले रोबोटिक मॉडल लगाए गए हैं। साथ ही आगंतुक यहाँ 3D फिल्म शो, तारामंडल ओर डिजिटल पैनोरमा का आनंद भी ले सकते हैं। कुरुक्षेत्र रेलवे जंक्शन से यह महज डेढ़ किमी और कृष्ण संग्रहालय एवं ब्रह्म सरोवर तालाब के समीप स्थित है।

माता भद्रकाली मंदिर : शक्तिपीठ

यह स्थान धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह हरियाणा में स्थित एकमात्र शक्तिपीठ है। मान्यता के अनुसार यहां माता सती के दाहिने पैर का टखना गिरा था। मंदिर में सफेद संगमरमर के कमल फूल पर माता के चरणों की प्रतिकृति स्थापित है। महाभारत से भी इस मंदिर का गहरा संबंध रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों के साथ यहाँ विजय की कामना के लिए माँ भद्रकाली की पूजा की थी। पांडवों ने युद्ध जीतने के बाद यहाँ अपने घोड़े दान किए थे। तब से यहां घोड़े दान की परंपरा शुरू है।

आज भी भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर यहां सोने, चांदी या मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार भी इसी पवित्र स्थान पर हुआ। वैसे तो सालभर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन चैत्र और अश्वनी नवरात्र एवं रक्षाबंधन के अवसर पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर कुरुक्षेत्र शहर में ही झांसा रोड पर स्थित है।

कुरुक्षेत्र की भूमि भले ही करोड़ों योद्धाओं के खून से रंजीत हुई है लेकिन अब यहां की धरती लाल नहीं है। धरती का रंग सामान्य है और बहुत ही उपजाऊ है। इस धरती पर धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, सूरजमुखी और सब्जियों की खेती बहुतायत मात्रा में की जाती है।