Lalluram Exclusive : आशुतोष तिवारी, जगदलपुर. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की तस्वीर अब बदलती हुई नजर आ रही है. इसी बदलाव के अभियान के बीच 24 मार्च का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ बनकर सामने आया है. मोस्ट वांटेड सीनियर नक्सली कमांडर पापा राव, जिसने वर्षों तक जंगलों को गोलियों की गूंज से अशांत रखा, उसने आखिरकार अपने 17 साथियों के साथ हथियार डालने का फैसला किया. मुख्यधारा में लौटने से पहले पापा राव ने लल्लूराम डॉट कॉम की टीम से एक्सक्लूसिव बातचीत की. इस बातचीत में उसने लोकतंत्र पर दोबारा भरोसा लौटने, बस्तर के भूगोल, माओवादी रणनीतियों और इलाके में तेजी से बढ़ते सुरक्षा कैंपों पर विस्तार से अपनी बात रखी.

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10 दिन खुद से जंग, फिर बदला मन

लल्लूराम डॉट कॉम से खास बातचीत में नक्सली कमांडर पापा राव ने बताया कि करीब 10 दिनों तक खुद से लड़ने के बाद उसने हथियार छोड़ने का निर्णय लिया. इस लड़ाई ने संगठन से ज्यादा नुकसान आम आदिवासी जनता को दिया है. उसे अब संविधान की ताकत पर भरोसा है. वह अब जल, जंगल और जमीन की लड़ाई बंदूक से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से लड़ने की बात कर रहा है.

डरकर नहीं समझदारी से लिया फैसला

नक्सली कमांडर पापा राव ने कहा कि यह आत्मसमर्पण डरकर नहीं, बल्कि समझदारी से लिया गया फैसला है. क्योंकि अब बस्तर का भूगोल बदल चुका है. चारों तरफ सुरक्षा बलों की मजबूत पकड़, लगातार बढ़ते कैंप और सिमटता हुआ जंगल है. इन हालातों में माओवादी रणनीति कमजोर पड़ चुकी है.

बंदूक की लड़ाई का कोई भविष्य नहीं : नक्सली पापा राव

खास बातचीत में नक्सली कमांडर पापा राव ने शीर्ष माओवादी नेता देवजी को लेकर भी अपनी प्रतिक्रिया दी. कहा कि देवजी के जाने के बाद भी वह डटा रहा, उसने सोचा था कि वह बस्तर की कमान संभालेगा. लेकिन हालात ने उसे आईना दिखा दिया कि अब बंदूक की लड़ाई का कोई भविष्य नहीं है. जो माओवादी मुख्यधारा में नहीं लौटे हैं, पापा राव ने उनसे जंगल छोड़ने, समाज में लौटने  की अपील की और कहा कि असली लड़ाई अब संविधान के भीतर ही जीती जा सकती है.