Chaitra Navratri 2026, गोरखपुर. शक्ति आराधना के महापर्व नवरात्र में देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है. लोग 9 दिनों तक माता की आराधना करते हैं. श्रद्धालु उन्हें अलग-अलग रूप और नामों से पूजते हैं. देशभर में स्थापित देवी मंदिरों की अपनी-अपनी मान्यता है. सबका अपना इतिहास है. ऐसा ही एक मंदिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित है. ये मंदिर मां तरकुलहा देवी (Maa Tarkulha Devi Temple) को समर्पित है. ये मंदिर करीब 200 साल पुराना है.

गोरखपुर मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर ये मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम का भी महत्वपूर्ण स्थल रहा है. मंदिर की कहानी चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह से जुड़ी है. बाबू बंधु सिंह (Babu Bandhu Singh) महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. बाबू बंधु सिंह ने अंग्रेजों से बचने के लिए जंगल में छिपकर तरकुल के पेड़ (Tarkul tree) के नीचे एक पिंडी स्थापित की थी. यहीं से उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया. उन्होंने कई अंग्रेज अफसरों को हराया. उनके बलिदान के दौरान तरकुल का पेड़ टूट गया, जिससे खून बहने लगा. तभी से इस पिंडी को तरकुलहा देवी के नाम से जाना जाने लगा.
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किवदंती है कि बंधु सिंह को जब फांसी दी जा रही थी तब 7 बार फांसी का फंदा टूटा था. अंततः बंधु सिंह ने देवी मां से प्रार्थना की और कहा कि हे मां मुझे अपने चरणों में बुला ले. तब उन्होंने खुद ही अपने गले में फंदा डाला और वीरगति को प्राप्त हुए. ये स्थल आज भी श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. मंदिर अब भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है. कहा जाता है कि मां के दरबार में जो भी मनोकामना मांगी जाती है, वो पूरी होती है.
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