रायपुर. महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर रामचरितमानस की यह चौपाई आज राजसत्ता के लिए भी प्रासंगिक है. “जय गिरिजापति दीनदयाला। सदा करत संतन्ह प्रतिपाला॥” इस चौपाई का अर्थ है, भगवान शिव दीन-दुखियों पर दया करने वाले हैं और सदा संतों की रक्षा और पालन करते हैं। भगवान शिव की करुणा, दया और उनके परम तत्त्व की वजह से भगवान शिव केवल देवता नहीं बल्कि चेतना के सर्वोच्च स्वरूप हैं। आज विश्व को करुणा और दया के लिए भगवान शिव से से प्रेरणा लेने की जरूरत है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि आत्म-जागरण और आत्म-परिवर्तन की पावन रात्रि है।

भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की वर्षगांठ भी है। यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि शिव यानी चेतना और पार्वती यानी शक्ति (ऊर्जा) का दिव्य मिलन है। आज भी जीवन में विचार और भावना, पुरुषार्थ और करुणा, कठोरता और कोमलता का संतुलन आवश्यक है जो जीवन को सफल बनाता है।
महाशिवरात्रि की पौराणिक मान्यता यह भी है कि इसी रात भगवान शिव निराकार से साकार रूप में शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। शिवलिंग जो अनंत ऊर्जा और सृष्टि के मूल तत्व का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि परम सत्य किसी रूप में बंधा नहीं है, वह सर्वत्र है।
समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष को कंठ में धारण कर महादेव ‘नीलकंठ’ कहलाए। समुद्र मंथन की कथा हमें सिखाती है कि जीवन में आने वाले क्रोध, ईर्ष्या, तनाव और नकारात्मकता जैसे विष को भीतर रोक कर उन्हें समाज में फैलने से बचाना चाहिए सही मायनों में यही सच्चा शिवत्व है।
योगशास्त्र के अनुसार महाशिवरात्रि की रात्रि को विशेष रूप से ध्यान और साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। क्योंकि इस दिन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति ऐसी होती है कि मानव शरीर की ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। जागरण की यह रात केवल आंखों से नहीं बल्कि चेतना से जागने की।
शिव का तांडव नृत्य सृष्टि के सृजन और विनाश दोनों ही चक्रों का प्रतीक है। आज भी वो इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जीवन में परिवर्तन ही स्थायी है और जो परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है वही आगे बढ़ता है। भागदौड़, आपाधापी, तनाव और प्रतिस्पर्धा से भरे हमारे जीवन में महाशिवरात्रि हमें पांच महत्वपूर्ण संदेश देती है। जिसमें पहला है कि उपवास केवल भोजन त्याग नहीं बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास है। आज के डिजिटल युग में कुछ समय मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर रहना भी एक प्रकार का व्रत है।
नीलकंठ महादेव की कथा हमें दूसरा सीख यह देती है कि विष को अपने तक सीमित रखना चाहिए उसे समाज में मत न फैलाएँ। आज सोशल मीडिया पर फैलती नकारात्मकता भी वही विष है। शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना ही शिव का संदेश है। शिव–पार्वती का विवाह हमें परिवार और समाज में संतुलन और सहयोग का मंत्र देता है। काम और परिवार के बीच संतुलन बनाना आधुनिक जीवन की बड़ी चुनौती है। इसके अलावा वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ध्यान (मेडिटेशन) से मानसिक तनाव कम होता है और महाशिवरात्रि हमें ध्यान की ओर प्रेरित करती है।
कैलाशवासी, गंगा को धारण करने वाले, नागों के स्वामी भगवान शिव प्रकृति के देवता हैं। महाशिवरात्रि का पर्व हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देता है। समाज में एकता, समरसता और सद्भाव का संदेश देने वाले महाशिवरात्रि को केवल मंदिर तक सीमित रहने वाला पर्व नहीं मानना चाहिए। यह आज जब समाज और राष्ट्र में विभाजन और वैमनस्य की घटनाएँ बढ़ रही हैं तब हमें शिव का स्वरूप याद दिलाता है कि वे देवों के भी देव हैं और असुरों के भी प्रिय रहे हैं। भगवान शिव सबको समान दृष्टि से देखते हैं।भगवान शंकर की वेशभूषा सादगी और विरक्ति का प्रतीक है, वे भस्म रमाते हैं, व्याघ्रचर्म धारण करते हैं और कैलाश पर्वत में निवास करते हैं। शिवजी की यह सादगी हमें उपभोगवाद से दूर रहने का संदेश देती है।
महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति का अवसर भी है। विष को अमृत में बदलने की कला, अंधकार में प्रकाश खोजने का साहस और नकारात्मकता को त्यागकर सकारात्मकता को अपनाने की प्रेरणा देने वाली महाशिवरात्रि में किए जाने वाले ‘ॐ नमः शिवाय’ के जाप में एक विशेष कंपन है जो भीतर की अशांति को दूर करता है।इस महाशिवरात्रि पर आइए संकल्प लें कि हम अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को त्यागकर शिवत्व को अपनाएँगे।हम ध्यान, संयम और सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएँगे। सच्ची महाशिवरात्रि वही है जिसमें हमारे भीतर का अंधकार समाप्त हो और नव-चेतना का प्रकाश प्रकट हो।
संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
News24 मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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