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Makar Sankranti: मकर संक्रांति के दिन सूर्य पूजा के साथ-साथ दान का भी बहुत महत्व है. आपको बता दें कि साल की 12 सूर्य संक्रांतियों में मकर संक्रांति सबसे खास मानी जाती है. आखिर इसकी वजह क्या है? आपको बता दें कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो वह पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ने लगता है, क्योंकि हमारा देश उत्तरी गोलार्ध में है. इसलिए, जैसे-जैसे सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ता है, दिन बड़े होते जाते हैं और रातें छोटी होती जाती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य की यह स्थिति बहुत शुभ मानी जाती है.
इस अवधि में धूप के कारण फसलें पकती हैं. मकर संक्रांति का पहला दिन पृथ्वी के लिए, दूसरा दिन हम इंसानों के लिए और तीसरा दिन जानवरों के लिए होता है. पृथ्वी को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया है क्योंकि हमारा अस्तित्व पृथ्वी से ही है. इसीलिए मकर संक्रांति को फसल उत्सव भी कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति से ठंड कम होने लगती है. धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व के अलावा मकर संक्रांति का आयुर्वेदिक महत्व भी है.
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इस संक्रांति के बारे में भी जानिए (Makar Sankranti)
आपको बता दें कि जब सूर्य मेष राशि में आता है तो मेष संक्रांति होती है. इसके अलावा इस दिन सूर्य के मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करने पर बैसाख का त्योहार मनाया जाता है. बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है. इस दिन को एक त्यौहार के रूप में भी मनाया जाता है. आपको बता दें कि जब सूर्य तुला राशि में प्रवेश करता है तो इसे तुला संक्रांति कहा जाता है. अक्टूबर के मध्य में इस दिन को कर्नाटक में तुला संक्रांति कहा जाता है. इसी दिन से कार्तिक स्नान भी प्रारंभ होता है.
मकर संक्रांति और कर्क संक्रांति के बीच 6 महीने का अंतर होता है. इस दिन सूर्य मिथुन राशि को छोड़कर कर्क राशि में प्रवेश करता है. आपको बता दें कि कर्क संक्रांति जुलाई के मध्य में आती है. इन सभी संक्रांतियों में मकरसंक्रांति का सबसे अधिक महत्व है क्योंकि यह सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों पर निर्भर करता है और सूर्य सबसे महत्वपूर्ण है.
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