अभय मिश्रा, मऊगंज। कानून की वर्दी पहनकर जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाए और अदालतों को गुमराह करने के लिए ‘गवाहों का सिंडिकेट’ चलाने लगे, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का बोलना जरूरी हो जाता है। मऊगंज से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पुलिस विभाग को शर्मसार कर दिया है। यह मामला तत्कालीन एसपी रसना ठाकुर के समय शुरू हुआ था, जिन्होंने रोहित गुप्ता की संदिग्ध मौत के मामले में पुलिस की लीपापोती को पकड़कर विभागीय जांच के आदेश दिए थे। लेकिन हैरत की बात यह है कि जिस अधिकारी पर हत्या दबाने के आरोप लगे, वही अधिकारी अब ‘पॉकेट गवाह’ कांड के मुख्य किरदार बनकर उभरे हैं। उन्होंने अपने निजी वाहन चालक को ही सरकारी गवाह बना दिया है, वो भी उस केस में जिसमें उन्होंने खुद कार्रवाई की थी।

खाकी के भीतर पनप रहे भ्रष्टाचार और स्वेच्छाचारिता का ये वो चेहरा है जिसे देखकर आप दंग रह जाएंगे। मऊगंज के रोहित गुप्ता हत्याकांड में जब पुलिस ने 263 दिनों तक फाइल दबाए रखी, तब तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रसना ठाकुर ने सख्त रुख अपनाया था। उन्होंने जांच में पाया कि पीएम रिपोर्ट में ‘हत्या’ का जिक्र होने के बाद भी मामला दर्ज नहीं किया गया। तत्कालीन एसपी ने इस घोर लापरवाही पर निरीक्षक अनिल काकड़े और साउनी माने खान के खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी थी।

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निजी ड्राइवर बना गवाह

एसपी रसना ठाकुर की कार्रवाई के बाद उम्मीद थी कि सुधार होगा, लेकिन मऊगंज पुलिस की कार्यप्रणाली और ज्यादा संदिग्ध हो गई। विभागीय जांच झेल रहे निरीक्षक अनिल काकड़े को हनुमना थाने की कमान क्या मिली, उन्होंने अपनी ही ‘समानांतर पुलिस’ खड़ी कर दी। आरोप है कि थानेदार साहब ने सरकारी गाड़ी के बजाय एक निजी वाहन चालक रखा है, जिसका नाम राजेश साकेत है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस निजी ड्राइवर को उन मामलों में गवाह बनाया जा रहा है, जिनमें खुद थानेदार साहब ने कार्रवाई की है।

पुलिस के बने फिक्स मोहरे

इसे कहते हैं ‘पॉकेट गवाह’ का खुला खेल! राजेश साकेत खुद स्वीकार कर रहा है कि वह साहब का ड्राइवर है और उसे उन एफआईआर की भनक तक नहीं जिनमें उसका नाम गवाह के तौर पर दर्ज है। ये वही मऊगंज पुलिस है जहां ‘सुपरमैन गवाह’ पाए जाते हैं, जो महज 50 मिनट के भीतर 6 अलग-अलग अपराध स्थलों पर मौजूद रहकर गवाही दे देते हैं। सूर्यमणि मिश्रा जैसे गवाह तो 264 केसों में पुलिस के फिक्स मोहरे बने हुए हैं।

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SC-HC की फटकार के बाद भी कान में जूं तक नहीं रेंगी

पॉकेट गवाहों के इस फर्जीवाड़े पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की फटकार भी मऊगंज के इन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। जिस मामले में खुद थानेदार ‘जज और गवाह’ दोनों तय कर रहे हों, वहां आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा? आखिर विभागीय जांच के बावजूद इन पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? आखिर किसका आशीर्वाद है इन ‘खाकीधारियों’ पर? एसपी रसना ठाकुर ने जिस जांच की बुनियाद रखी थी, उसे अंजाम तक पहुंचाने के बजाय ये अधिकारी नए-नए फर्जीवाड़ों को अंजाम दे रहे हैं। निजी ड्राइवरों को सरकारी गवाह बनाना न केवल नैतिकता के खिलाफ है, बल्कि कानून की आंखों में धूल झोंकना है।

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