पुरुषोत्तम पात्रा. रायपुर. शासन की तमाम दावों के बाद भी छत्तीसगढ़ से पलायन का अभिशाप खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, ग्रामीण क्षेत्र के लोग आज भी रोजी-रोटी के लिए दूसरे प्रदेशों का रुख करने पर मजबूर हो रहे हैं.

ये है गरियाबंद जिले का कुल्हाडीघाट गांव, वैसे तो इस गांव की पहचान दिल्ली तक है, क्योंकि प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गांधी अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ यहॉ आये थे, उन्होंने इस गांव को गोद भी लिया, उसके बाद कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मोहसिना किदवई ने भी इस गांव को गोद लिया, मगर इतना सब होने के बाद भी कुल्हाडीघाट की तस्वीर और यहॉ के लोगों की तकदीर नहीं बदली. आज भी गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है. मनरेगा का काम भी लोगों को नहीं मिल पाया, लोगों को रोजी-रोटी की तालाश में पलायन करने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

पलायन का आंकड़ा देख दौड़े-दौड़े पहुंचे अधिकारी

कुल्हाडीघाट में घरों के बाहर लगे ताले ये बताने और समझने के लिए काफी है कि घर के अंदर कोई नहीं है, ऐसे नजारे यहॉ हर गली में देखने को मिल जाएंगे, पूरा गांव सुनसान पड़ा हुआ है, गलियां विरान हैं, क्योंकि गांव के 137 लोग पलायन कर चुके हैं, पंचायत सचिव ने पलायन का ये आंकडा जब जिला प्रशासन को भेजा तो जिम्मेदार अधिकारी दौड़ते हुए गांव पहुंच गये, गलती खुद की थी इसलिए उसे छुपाने के लिए मीडिया से बचकर निकल गये, मगर अब तक विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर दिये.

137 लोग कर चुके हैं गांव से पलायन

पंचायत ने अधिकारियों को पलायन किए गए लोगों की जो सूची सौंपी है, उसके मुताबिक कुल्हाडीघाट मुख्यालय से 48, आश्रित गांव कठवा से  07, आश्रित गांव मटाल से  20, आश्रित गांव बेसराझर से 25, आश्रित गांव गंवरमड से 27, आश्रित गांव भालूडिग्गी से 04, आश्रित गांव देवडोंगर से  06 को मिलाकर कुल 137 लोग पलायन कर चुके हैं. योजना बनाने में नाकामी सरकार की रही हो या फिर योजनाएं सही ढंग से क्रियान्वयन नही करने में जिला प्रशासन विफल रहा हो दोनों ही परिस्थितियों में नुकसान ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है, प्रदेश में रोजगार की अपार संभावनायें होने के बाद भी प्रदेश की जनता को रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों पर निर्भर होना पड़ रहा है, ऐसे में योजना के बनाने वालों और उसको क्रियान्वयन करने वालो पर सवाल उठाने लाजमी है.