दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की महिला प्रोफेसर के खिलाफ अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी दिल्ली हाई कोर्ट ने रद कर दी है। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने स्पष्ट कहा कि हर तरह का विवाद या दुर्व्यवहार अपने आप में SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक उसमें जाति आधारित अपमान की मंशा साबित न हो।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एससी-एसटी कानून की धारा-तीन के तहत अपराध तभी बनता है जब स्पष्ट हो कि उक्त कृत्य पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा से किया गया हो। प्राथमिकी के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से है और उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया हो।

क्या है मामला ?

यह मामला दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज की दो एसोसिएट प्रोफेसरों के बीच हुई बहस से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कॉलेज में हिंदी विभाग की इंचार्ज हैं। याचिका के अनुसार, 16 अगस्त 2021 को विभागीय बैठक में नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (नैक) के मिनट्स तैयार किए गए थे और बैठक में शामिल सभी संबंधित सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी थे।

याचिकाकर्ता ने शिकायत करने वाली एसोसिएट प्रोफेसर से मिनट्स को पढ़ने और हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया था। हस्ताक्षर के बाद जब वह रजिस्टर ले जाने लगीं तो उनके हाथ से रजिस्टर वापस लेने की कोशिश की और उन्होंने बाल खींचे एवं रजिस्टर का एक पन्ना फाड़ दिया।

पुलिस से घटना की शिकायत की, जाति का कोई जिक्र नहीं था

शिकायत करने वाली एसोसिएट प्रोफेसर ने 17 अगस्त, 2021 को प्रिंसिपल व पुलिस से घटना की शिकायत की, जिसमें जाति का कोई जिक्र नहीं था। जातिवादी टिप्पणी बाद में जोड़ी गई, लेकिन उसमें भी कोई खास तथ्य नहीं थे। छह दिन बाद 23 अगस्त को फिर शिकायत की, जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी।

दूसरी शिकायत में भी कोई खास जातिवादी टिप्पणी या बात कहने का आरोप नहीं लगाया गया। अदालत ने कहा कि जातिवादी टिप्पणियों का जिक्र केवल अस्पष्ट और सामान्य शब्दों में किया गया। शिकायत है कि एसोसिएट प्रोफेसर ने कहा था कि ये लोग पिछड़े इलाके से आते हैं और खराब माहौल बना रहे हैं।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m