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मैनपाट। मैनपाट में मॉडल स्कूल को डीएवी को संचालित करने का फैसला मैनपाट में बुरी तरह असफल साबित हुआ. पहले ही साल डीएवी द्वारा संचालित नर्मदापुर के डीएवी मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल से  12 वीं में एक छात्रा ही पास हो सकी. छात्रा संस्कृति सिंह ही बारहवीं में पढ़ने वाले 18 दूसरे छात्र फेल हो गए.

इस बारे में एक अधिकारी का कहना है कि अभी सभी स्कूलों से डेटा नहीं आए हैं लिहाज़ा वो जानकारी देने में असमर्थ हैं. लेकिन लल्लूराम डॉट कॉम को जो जानकारी मिल रही है . उसके अनुसार बाकी जगहों के स्कूलों का भी यही हाल है. पूरे संभाग में नतीजे 10 प्रतिशत से भी कम होने की खबर है. आज इस संबंध में कलेक्टर किरण कौशल ने डीएवी के शिक्षकों के साथ बैठक भी की हैं.

बताया जा रहा है कि सरगुजा जिले के बाकी डीएवी संचालित स्कूलों का ऐसा ही बुरा हाल है. सब जगह गिनती के छात्र ही बारहवीं उत्तीर्ण कर सके हैं. सरगुजा जिले के डीएवी स्कूलों के संचालन का जिम्मा स्थानीय स्तर पर डीएवी भटगांव को दिया गया था.

आदिवासी और दूरस्थ अंचल में बेहतर पढ़ाई के लिए राज्य सरकार ने मॉडल स्कूलों को डीएवी को सौंप दिया था. मैनपाट में पूरे साल पढ़ाई की खानापूर्ति की जाती रही. विज्ञान विषय में केवल जीव विज्ञान के अलावा रसायन शास्त्र और कामर्स विषयों का कोई भी शिक्षक नहीं था.  छात्रों से बिना विषय के शिक्षक के पढ़ाई की गई.

हर पिछले और आदिवासी विकासखंड में केंद्र ने खोले थे मॉडल स्कूल

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व पिछड़े व आदिवासी क्षेत्रों के हर विकासखंड में सीबीएसई पाठ्यक्रम के साथ माडल स्कूल की स्थापना की थी. सरकारी ढर्रे पर चल रहे माडल स्कूलों को मई 2015 में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को हस्तांतरित कर दिया था. पिछले साल छत्तीसगढ़ शासन ने प्रदेश के लगभग 75 मॉडल स्कूलों का संचालन कामर्शियल आधार पर किए जाने का निर्णय लिया और इनका संचालन डीएवी कालेज मैनेजिंग कमेटी नई दिल्ली से कराने का समझौता किया.

मॉडल स्कूलों को पीपीपी मॉडल के तहत डीएवी को दिया गया था

 

इसके तहत सरगुजा जिले के मैनपाट सहित सातों मॉडल स्कूलों को भी डीएवी को सौंप दिया गया था. स्कूल के संचालन में इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या न आए इसके लिए सभी स्कूलों को सौंपने से पहले वहां बड़ी बिल्डिंगे बनवाई गई. पहले मॉडल स्कूल में छठवीं से बारहवीं की पढ़ाई होती थी. लेकिन डीएवी को इसे संचालित करने में आर्थिक दिक्कत न हो इसलिए इसे पहली से बारहवीं तक किया गया था.