इमरान खान, खंडवा। Special Story: मध्य प्रदेश के खंडवा में एक ऐसी दुनिया भी है, जहां आज भी लोग भूत प्रेत और अंधविश्वास में भरोसा रखते हैं। बात खंडवा के उस सैलानी दरगाह की जहां पर बुरी आत्माओं से लोगों को निजात मिलती है। ऐसा माना जाता है कि यहां पर बुरी आत्माओं की बाबा सैलानी के इस मेले में आते है।
अपने-अपने जीवन में तरह-तरह के मेले देखे होंगे। झूठों के माध्यम से गोलगप्पे खाते हुए अपने इन मेलों का आनंद भी लिया होगा, लेकिन कभी अपने भूतों के मेले के बारे में सुना है। आप कहेंगे नहीं तो चलिए आज हम आपको एक ऐसे मेले में ले चलते हैं जहां एक नहीं दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में भूतों का मेला लगता है। आज हम जिस मेले की बात करने जा रहे हैं, वहां पर ना तो कोई मस्ती होती है ना कोई झूल लगते हैं, बल्कि यहां लगता है भूतों का मेला।
यहां होती है बुरी आत्माओं की पेशी
हम बात कर रहे है खंडवा के एक ऐसे मेले की जहां पर बुरी आत्माओं की पेशी लगवाई जाती है और यहां पर सजा के तौर पर बुरी आत्माओं को शरीर छोड़कर जाने का फैसला सुनाया जाता है। खंडवा से 25 किलोमीटर दूर जावर गांव के पास सैलानी गांव में सैलानी बाबा की एक अद्भुत मजार है। इस मजार पर यूं तो सालभर लोगों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन होली के बाद से लेकर रंग पंचमी तक यहां देश के अलग-अलग हिस्से से भूत, प्रेत, बुरी आत्माओं से पीड़ित बाधित लोग पहुंचते हैं। ऐसे ऐसे परेशान लोग यहां पहुंचते हैं जिसे देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि लोग यहां आते तो दुख में हैं, लेकिन यहां से वापस लौटने वाले खुशी-खुशी वापस लौटते हैं।
तांडव करने लगती है बाहरी शक्तियां
सैलानी बाबा की इस दरगाह पर कोई जंजीर में बांधकर लाया गया है तो कोई महीनों से प्रेत बाधा से पीड़ित। ऐसे लोगों को परिजन देश के कोने कोने से यहां लेकर पहुंचे हैं। ऐसा माना जाता है कि दरगाह की लोहे की इस चारदीवारी में इतनी शक्ति है कि इसे छूते हीं बाहरी शक्तियां तांडव करने लगती है और गुनाहों को कुबूल कर सैलानी से पनाह मांगती है। बाबा की चौखट पढ़ते ही बड़े से बड़ा भूत तांडव करने लगता है। बाबा सैलानी की दरगाह पर पहुंचने के बाद न्याय मांगने के लिए बुरी आत्माएं यहां अपना गुनाह कुबूल कर बाबा सैलानी से पनाह मांगती है। शरीर से अलग होने के लिए आत्माओं को बाबा सजा देते हैं। सजा भी ऐसी जो खुली आंखों से नहीं दिखती है। सिर्फ शैतानी आत्माएं ही इस सजा को महसूस करती है। ऐसी में इन बुरी आत्माओं को शरीर छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं।
मुर्गे और बकरे की बलि
वर्ष 1939 में स्थापित बाबा की इस दरगाह में होली से लेकर रंग पंचमी तक देशभर से हजारों लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरु हो जाता है। गांव का नाम भी बाबा के नाम पर ही सैलानी रखा गया है। देशभर से आए लोग यहां तंबू बना कर कई दिनों तक रहते हैं। मान्यता है कि 5 गुरुवार को नियमित यहां आने से पीड़ितों को फायदा होता है। यहां मुर्गे और बकरे की बलि दी जाती है। लोग मुर्गे और बकरे को लाते हैं और बाबा के नाम पर यहीं छोड़ जाते हैं।
87 साल पुरानी है दरगाह
सैलानी बाबा की दरगाह करीब 87 साल पुरानी है, जो महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के फकीर मकदूम शाह सैलानी की है। हालांकि इस दरगाह की एक खास बात ये भी है कि यहां सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल भी देखने को मिलती है। यहां हिंदू कैलेंडर की तारीख के अनुसार होली से रंग पंचमी तक मेला लगता है, जिसमें सभी धर्मों के लोग आते हैं। बहरहाल आस्था और अंधविश्वास के इस खेल में कोई भी तर्क काम नहीं करता। लोग सिर्फ अपनी समस्याओं को लेकर आते हैं और खुशी–खुशी लौट जाते हैं।
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