मुंगेर। जिले में सरकारी नौकरी पाने की लालसा ने दो युवकों को जेल पहुंचा दिया। रेलवे टेक्नीशियन भर्ती 2024 में मुकेश कुमार ने आवेदन तो किया, लेकिन परीक्षा देने के लिए अपने पड़ोसी और कोचिंग संचालक रंजीत कुमार से सौदा कर लिया। छह लाख रुपये नकद के बदले रंजीत ने मुकेश की जगह परीक्षा देने की हामी भर दी। पकड़े जाने से बचने के लिए दोनों ने एडिटिंग के जरिए एक “हाइब्रिड फोटो” तैयार की, जिसमें दोनों के चेहरे की समानता दिखती थी, ताकि जरूरत पड़ने पर उसे उम्र या लुक में बदलाव का बहाना बनाया जा सके।

जुलाई 2025 में मुकेश का चयन हो गया

इसी फोटो के आधार पर रंजीत ने पटना में कंप्यूटर आधारित परीक्षा दी और बाद में भोपाल में मेडिकल भी पास कर लिया। जुलाई 2025 में मुकेश का चयन हो गया। उसने दमोह, सागर और जबलपुर रेल मंडलों में नौकरी भी की। अक्टूबर 2025 में उसे प्रयागराज ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। करीब डेढ़ साल तक यह फर्जीवाड़ा सिस्टम की नजर से बचा रहा।

वेरिफिकेशन ने पूरा खेल बिगाड़ दिया।

लेकिन रेलवे के अनिवार्य रैंडम बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। 14 नवंबर 2025 को जब मुकेश का अंगूठा और फेस स्कैन लिया गया तो वह भर्ती के समय दर्ज डेटा से मेल नहीं खाया, क्योंकि असली परीक्षा रंजीत ने दी थी। मामला सामने आते ही मुकेश फरार होकर बिहार लौट गया। जबलपुर स्थित केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की टीम ने मुंगेर में छापेमारी कर मुकेश को गिरफ्तार किया और उसकी निशानदेही पर रंजीत को भी पकड़ लिया। अब जांच यह पता लगाने पर केंद्रित है कि क्या इस तरह की और भी भर्तियों में गड़बड़ी हुई है। यह मामला आधार और बायोमेट्रिक सिस्टम की सख्ती को भी उजागर करता है। भारतीय रेल में सत्यापन की प्रक्रिया ने अंततः असली और नकली के बीच फर्क साफ कर दिया।