अब डिप्रेशन की पहचान सिर्फ सवाल-जवाब या टेस्ट तक सीमित नहीं रहेगी। डॉक्टरों का कहना है कि किसी व्यक्ति की आवाज और बोलने का तरीका उसकी मानसिक सेहत के बारे में अहम संकेत दे सकता है। दिल्ली के AIIMS की एक रिसर्च में यह सामने आया है कि स्पीच एनालिसिस यानी बोलने के पैटर्न का विश्लेषण कर डिप्रेशन के शुरुआती लक्षण पहचाने जा सकते हैं। एम्स के स्पीच हेल्थ लैब में किए गए इस अध्ययन में 423 लोगों पर शोध किया गया, जिसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।
AIIMS में AI से डिप्रेशन की शुरुआती पहचान पर रिसर्च
एम्स के सायकायट्री विभाग के डॉ. नंद कुमार के अनुसार, एम्स में कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) के CSR सहयोग से एक अत्याधुनिक स्पीच हेल्थ लैब विकसित की गई है। इस लैब में AI की मदद से आवाज के भाषाई और भावनात्मक संकेतों का विश्लेषण कर डिप्रेशन के शुरुआती लक्षणों की पहचान पर काम किया जा रहा है। पिछले दो वर्षों में लैब ने 423 प्रतिभागियों के स्पीच सैंपल और मानसिक स्वास्थ्य आकलन को मिलाकर अध्ययन किया। इस रिसर्च से उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में आवाज के पैटर्न से मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी और समय पर हस्तक्षेप संभव हो सकेगा।
इतनी पर्सेंट लोगों में जांच सटीक
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह तकनीक डॉक्टर का विकल्प नहीं है, बल्कि शुरुआती चेतावनी देने और समय पर इलाज सुनिश्चित करने में मदद करने वाला एक सहायक टूल हो सकती है। वैश्विक स्तर पर डिप्रेशन एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। वर्तमान में दुनिया भर में 26 करोड़ से अधिक लोग डिप्रेशन से प्रभावित हैं। भारत में 2015 के नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के अनुसार हर 20 में से 1 भारतीय, यानी लगभग 5.3% आबादी, जीवन में कभी न कभी डिप्रेशन का सामना कर चुका है।
डिप्रेशन की सबसे गंभीर जटिलताओं में आत्महत्या शामिल है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की महत्ता और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीक भविष्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सुलभ और प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है।
डिप्रेशन की पहचान की सटीकता
सटीकता (Accuracy): 78% सटीकता (accuracy) का मतलब है कि कुल प्रतिभागियों में सही ढंग से डिप्रेशन या न-डिप्रेशन की पहचान कितनी बार हुई। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नया अध्ययन डिप्रेशन की शुरुआती पहचान के लिए नई दिशा दिखा रहा है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि आवाज के पैटर्न, टोन और ऊर्जा में बदलाव डिप्रेशन के संकेत दे सकते हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह तकनीक डॉक्टर का विकल्प नहीं, बल्कि शुरुआती पहचान और समय पर इलाज में मदद करने वाला सहायक टूल है।
दुनिया भर में डिप्रेशन से 26 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हैं। भारत में 2015 के नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के अनुसार हर 20 में से 1 भारतीय यानी लगभग 5.3% आबादी जीवन में कभी न कभी डिप्रेशन से जूझ चुका है। डिप्रेशन की सबसे गंभीर जटिलताओं में आत्महत्या शामिल है। शोध के अनुसार, इस तरह की तकनीक शुरुआती चेतावनी देने में मदद कर सकती है, जिससे समय पर इलाज और मानसिक स्वास्थ्य सुधार की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।
कॉलेज स्टूडेंट्स में तेजी से बढ़ रहा डिप्रेशन और आत्महत्या का खतरा
कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां तेजी से बढ़ रही हैं। नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक बड़े अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। यह रिसर्च इंडियन जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन में 9 राज्यों के 15 शहरों की 30 यूनिवर्सिटीज़ के 8,542 छात्रों को शामिल किया गया। 18.8% छात्रों ने जीवन में कभी आत्महत्या के विचार होने की बात कही। 12.4% छात्रों ने पिछले एक साल में ऐसे विचार आने की जानकारी दी। 6.7% छात्रों ने आत्महत्या का प्रयास किया। 33.6% छात्रों में मध्यम से गंभीर डिप्रेशन के लक्षण पाए गए। 23.2% छात्रों में गंभीर एंग्जायटी देखी गई। केवल 38.1% छात्रों ने अपने आत्महत्या के विचार किसी से साझा किए, वह भी ज़्यादातर दोस्तों के साथ।
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