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रायपुर. राजीव गांधी भूमिहीन मजदूर न्याय योजना के लागू होने की तारीख 1 हफ्ते के लिए टल गई है. लेकिन इसे लेकर सवाल-जवाब और चर्चाओं का दौर शुरु हो चुका है. क्योंकि प्रदेश में पहली बार कोई सरकार सबसे गरीब और संसाधनविहीन आबादी को सीधे नगदी हस्तांरित करने जा रही है.

इस योजना और उसके असर पर अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों की पैनी नज़र है.

रविशंकर विश्विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ रविंद्र ब्रम्हे इसे वंचित समुदाय के लिए अच्छा कदम मानते हैं. उनका कहना है कि ये सार्थक कदम है. ये राशि कितनी होनी चाहिए, इस पर बहस हो सकती है. डॉ ब्रम्हे का कहना है कि गरीबी को दूर करने के लिए आपको विविध तरीके से प्रहार करना होगा, जिसमें से कैश ट्रांसफर एक तरीका है. सरकार पहले से मनरेगा और खाद्य सुरक्षा के ज़रिए इसे कमजोर कर रही है. वे कहते हैं कि इस तरह की योजना अब तक नहीं थी.

लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंधोपाध्याय इसे अस्थाई समाधान मानते हैं. वे कहते हैं कि इस शुरुआत भूमिहीन मज़दूरों के आजीविका के साधन को खोजना भी ज़रुरी है ताकि स्थाई निराकरण हो सके. वे कहते हैं कि संसाधनों के वितरण पर ध्यान होगा. व्यवस्थित संसाधन बहुल प्रदेश में संसाधन आधारित अर्थव्यवस्था पर ज़ोर देना होगा. युवा वर्ग को खपाने वाली अर्थनीति पर ज़ोर देना होगा.

हालांकि सिर्फ छह हज़ार की राशि को वे न्यायपूर्ण नहीं मानते. वे कहते हैं कि ये राशि गरीबों को मदद कर सकती है लेकिन न्याय का एहसास नहीं कराती. वे कहते हैं कि गरीबों को परिवार चलाने लायक पैसा देना था. गौतम बंधोपाध्याय इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि सरकार को गांव आधारित योजना बनानी होगी. जिसमें भूमिहीन मज़दूर को खपा सके. जब तक ऐसी योजना न बना सकें. तब तक स्थाई विकास नहीं हो पाएगा.

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर डॉक्टर अनुपमा सक्सेना का कहना है कि ये जिस तबके को राशि दी जा रही है, उस तबके के पास नियमित आय नहीं है. न इनके पास तनख्वाह है न सेविंग है. इनके लिए न्यूनतम आय भी बहुत बड़ा सहयोग है. अगर 6 हज़ार रुपये भी नियमित आय के रुप में मिल रहा तो इसका उन्हें काफी लाभ मिल सकता है. ये उनके परिवार के पाेषण, बच्चों की शिक्षा या साइकिल खरीदने में खर्च हो सकता है. ये पैसे उन परिस्थियों में भी काम आएंगे जब उनके पास काम नहीं होता.

डॉ अनुपमा सक्सेना मानती हैं कि इससे बाज़ार में भी तेज़ी आएगी क्योंकि ये तबका पैसे बचाता नहीं है बल्कि खर्च करता है तो बाज़ार में तेज़ी से उत्पादों की मांग बढे़गी और रोज़गार के अवसर भी पैदा होंगे. उनका कहना है कि ये हितग्राहियों के खाते में पैसे डालने की छत्तीसगढ़ की पहली योजना है जिसमें उन्हें पैसे किसी उत्पाद या सेवा के बदले नहीं दिए जा रहे हैं. नगदी हस्तांतरण की जितनी योजनाएं हैं, उसे लेकर रिसर्च में ये बात सामने आई है कि इससे लोगों को फायदा होता है. वो नगदी पाकर अपनी खर्च की प्राथमिकताएं खुद तय करता है.

हांलाकि इस योजना का डॉक्टर अनुपमा एक बड़ा खतरा देखती हैं. वे कहती हैं कि पैसे महिलाओं की बजाय पुरुषों के एकाउंट में डालने से एक बड़ा खतरा है कि ज़्यादातर पैसे शराब में खर्च हो जाएंगे.

वे छत्तीसगढ़ राज्य बनने के दौरान के अध्ययन का हवाला देती हैं. देश में औसत 17 फीसदी आबादी शराब पीती है लेकिन छत्तीसगढ़ में ये दोगुने से ज़्यादा 37 फीसदी है. शराब पीने में बड़ा तबका मज़दूरों का है, इसलिए जब पैसे उनके एकाउंट में जाएंगे तो इस बात की ज़्यादा संभावना है कि वो पैसे घर पहुंचने से पहले शराब भट्टी में खत्म हो जाएं और इसका खामियाजा भी महिलाओं को भुगतना पड़ेगा क्योंकि शराब पीकर घर में हिंसा करने के मामले में भी छत्तीसगढ़ पूरे देश में सबसे बुरे राज्यों में से एक है.

वे इस राशि को महिलाओं के खाते में डालने की पुरज़ोर वकालत करती हैं. वे कहती हैं कि इससे एक हद तक कंट्रोल उनके हाथ में होता है.

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