जगदलपुर। दुनिया भर में अपनी अनूठी परंपराओं और भव्यता के लिए मशहूर बस्तर दशहरा इस साल और खास हो सकता है. दरअसल, 60 साल से टूटी हुई एक पुरानी परंपरा को फिर से जीवंत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. यदि सब कुछ ठीक रहा तो इस बार दशहरे में बस्तर राज परिवार के सदस्य कमल चंद भंजदेव और उनकी पत्नी माता दंतेश्वरी का छत्र लेकर रथ पर विराजमान होंगे.

बता दें, बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा का संगम है. हर साल यहां मां दंतेश्वरी का छत्र रथ पर विराजित कर हजारों श्रद्धालु परिक्रमा की परंपरा निभाते हैं. रियासत काल में इस परंपरा की भव्यता और बढ़ जाती थी, जब राजा-रानी एक साथ छत्र लेकर रथ पर बैठते थे.

कब टूटी थी परंपरा?

यह परंपरा 1961 से 1965 के बीच आखिरी बार निभाई गई थी. उस समय राजा प्रवीणचंद भंजदेव रथ पर छत्र लेकर बैठे थे. विवाह न होने की वजह से आगे यह परंपरा टूट गई. लेकिन हाल ही में बस्तर रियासत प्रमुख कमलचंद भंजदेव का विवाह हुआ है. दशहरा समिति और बस्तरवासी इस परंपरा को दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे हैं. बस्तर सांसद महेश कश्यप ने भी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कानूनी अड़चनों को दूर करने की अपील की है.

वहीं बस्तर वासियों का भी मानना है कि यदि यह परंपरा फिर शुरू होती है तो बस्तर दशहरा की भव्यता कई गुना बढ़ जाएगी. आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी संस्कृति और परंपरा को करीब से समझने का अवसर मिलेगा.

बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने कहा कि “यह परंपरा बस्तर की अस्मिता और आस्था से जुड़ी है. यदि इसे फिर से जीवंत किया जाए तो यह हमारे लिए गौरव की बात होगी.” 

बस्तर सांसद महेश कश्यप ने कहा कि “मैंने केंद्र और राज्य सरकार से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का आग्रह किया है. कानूनी अड़चनों को दूर किया जाए तो बस्तर दशहरा और भी ऐतिहासिक बन सकता है.”

अब देखना होगा कि क्या दशकों पुरानी यह परंपरा वास्तव में फिर से लौट पाती है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि बस्तर दशहरा 2025 भी अपनी भव्यता और अनूठी परंपराओं से पूरी दुनिया का ध्यान खींचेगा.