दिल्ली सरकार ने प्रिंटिंग उद्योग को बड़ी राहत देते हुए ‘फ्लेक्स/विनाइल/पीवीसी पर डिजिटल प्रिंटिंग’ को ग्रीन कैटेगरी की गतिविधि में शामिल कर लिया है। अधिकारियों ने गुरुवार को इसकी जानकारी देते हुए बताया कि इस फैसले से कारोबार करना आसान होगा और पर्यावरण सुरक्षा के मानकों का भी पालन सुनिश्चित किया जा सकेगा। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक ग्रीन कैटेगरी में उन उद्योगों को रखा जाता है, जिनका प्रदूषण स्तर कम होता है और जिनका प्रदूषण सूचकांक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा तय सीमा के भीतर रहता है। इस श्रेणी में शामिल होने से संबंधित उद्योगों को मंजूरी और लाइसेंसिंग प्रक्रिया में कम बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इस निर्णय के साथ ही दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति का वर्गीकरण अब सीपीसीबी के दिशानिर्देशों के अनुरूप हो गया है। इससे प्रिंटिंग क्षेत्र से जुड़े उद्यमों को तेजी से स्वीकृति मिलने का रास्ता साफ होगा।

मंत्री सिरसा ने कहा कि पिछले साल ग्रीन कैटेगरी उद्योगों के लिए संचालन समय में ढील दी गई थी और यह फैसला उसी कड़ी में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) को आगे बढ़ाने वाला एक और बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि इससे दिल्ली के तेजी से बढ़ते प्रिंटिंग सेक्टर के उद्यमियों को सीधा लाभ मिलेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुरूप है, जिससे प्रदूषण नियंत्रण से कोई समझौता किए बिना विकास को बढ़ावा दिया जा सकेगा।

सिरसा ने जोर देकर कहा कि वर्तमान सरकार ने डेटा आधारित और संतुलित रणनीति अपनाई है, जिसके तहत कम जोखिम और कम प्रदूषण वाले उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए श्रेणियों का युक्तिकरण किया गया है। उनका कहना है कि इस तरह के फैसले न सिर्फ उद्योगों को बढ़ावा देंगे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी मजबूत कदम साबित होंगे।

दिल्ली सरकार के नए फैसले के तहत अब फ्लेक्स, विनाइल और पीवीसी पर डिजिटल प्रिंटिंग समेत 125 से अधिक उद्योगों को ग्रीन कैटेगरी में शामिल कर लिया गया है। इस सूची में परिधान, एल्युमीनियम उत्पाद, आयुर्वेदिक इकाइयां, फर्नीचर, पैकेजिंग, ऑप्टिकल सामान, खिलौने और कोल्ड स्टोरेज जैसे कई क्षेत्र भी शामिल हैं। पर्यावरण एवं उद्योग मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि ये अधिकांश व्यवसाय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) द्वारा संचालित होते हैं, जिन्हें इस फैसले से सीधा फायदा मिलेगा। उन्होंने इसे छोटे कारोबारियों के लिए बड़ा प्रोत्साहन बताया।

अधिकारियों के मुताबिक, ग्रीन कैटेगरी में आने वाली इकाइयों को अब संचालन की अनुमति (Consent to Operate – CTO) हासिल करने में काफी आसानी होगी। सरकार ने जुलाई में ही इसकी समयसीमा 120 दिनों से घटाकर 20 दिन कर दी थी। सबसे अहम बदलाव यह है कि यदि तय समयसीमा में कोई निर्णय नहीं लिया जाता, तो आवेदन को स्वतः स्वीकृत (deemed approval) मान लिया जाएगा। इससे उद्यमियों को बार-बार कागजी कार्रवाई और देरी से राहत मिलेगी।

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