रायपुर। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर धान खरीदी के आंकड़े एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गए हैं। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि राज्य में जितनी धान की खेती होती है, उससे कहीं अधिक मात्रा में सरकार द्वारा धान की खरीदी की जा रही है। उत्पादन और खरीदी के बीच यह बड़ा अंतर अब एक संगठित तंत्रगत गड़बड़ी की ओर इशारा कर रहा है।

कृषि विभाग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार धान उत्पादन का आकलन खेतों की गिरदावरी, मोबाइल फोटोग्राफी और राजस्व अमले की रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है। इसके बावजूद हर साल सरकारी खरीदी के आंकड़े वास्तविक उत्पादन से आगे निकल जाते हैं। जानकारों का कहना है कि कई क्षेत्रों में बिना धान की खेती किए ही खेतों को धान उत्पादक दर्शा दिया जाता है।

सूत्रों के मुताबिक इस प्रक्रिया में पटवारी, धान खरीदी केंद्रों के कर्मचारी और कुछ राइस मिलरों की भूमिका संदिग्ध बताई जाती है। आरोप है कि कागजों में खेती दिखाकर धान बेचने के लिए पंजीयन करा दिया जाता है, जबकि जमीन पर वास्तविक उत्पादन नहीं होता। कई मामलों में किसानों को यह तक पता नहीं चलता कि उनके नाम पर धान की बिक्री दर्ज कर दी गई है।

इतना ही नहीं, पड़ोसी राज्यों से धान लाकर उसे छत्तीसगढ़ की खरीदी व्यवस्था में खपाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। इससे न केवल सरकारी आंकड़े प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि राज्य के खजाने पर भी भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। जांच के दौरान कुछ जिलों में धान खरीदी केंद्रों पर गंभीर गड़बड़ियां उजागर हुई है। एक मामले में रिकॉर्ड में दर्ज हजारों क्विंटल धान गोदामों से गायब पाया गया, जिसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी गई। जांच में फर्जी बिल, मजदूरों की झूठी उपस्थिति और निगरानी व्यवस्था से छेड़छाड़ जैसे तथ्य भी सामने आए हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खरीफ विपणन वर्ष 2024-25 में राज्य सरकार ने लगभग 149.25 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह संख्या पिछले वर्ष 2023-24 के 144.92 लाख मीट्रिक टन के रिकॉर्ड से भी अधिक है। सरकार के मुताबिक, इस अभियान में 25,49,592 पंजीकृत किसानों ने धान बेचा और उनके बैंक खातों में करीब ₹31,089 करोड़ की राशि अंतरित की गई। इस साल की धान खरीदी का अंतिम आंकड़ा आना अभी बाकी है।

हालांकि, कुछ जानकारों का दावा है कि पिछले साल की कुल खरीदी में लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान केवल कागजों में जोड़ा गया, जिसका वास्तविक उत्पादन से कोई संबंध नहीं था। इससे सरकारी खर्च में हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ा।

विशेषज्ञों का कहना है कि समर्थन मूल्य योजना और निगरानी तंत्र के बावजूद वास्तविक उत्पादन और खरीदी के आंकड़ों के बीच इतना बड़ा अंतर अब भी स्पष्ट नहीं हो सका है। उनका मानना है कि यदि उत्पादन के सही आंकड़ों पर आधारित सख्त निगरानी और स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तो सरकार को अनुमानतः कम से कम ₹10,000 करोड़ की बचत संभव हो सकती थी।