पटना/आरा। साल 2015 के चर्चित आरा सिविल कोर्ट बम ब्लास्ट मामले में पटना हाई कोर्ट ने एक बड़ा न्यायिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत (आरा सिविल कोर्ट) द्वारा मुख्य आरोपी को दी गई फांसी और अन्य सात दोषियों की उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। साक्ष्यों के अभाव और पुलिस जांच में खामियों के चलते हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों की सजा घटाकर महज 2 साल कर दी है, जिसे वे पहले ही काट चुके हैं।

​पुलिस जांच पर उठे सवाल

​मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद की खंडपीठ ने डिफेंस वकील विष्णुधर पांडेय की दलीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। बचाव पक्ष का तर्क था कि पुलिस इस साजिश की जड़ तक पहुंचने में विफल रही। बम कहां से आया, साजिश कहां रची गई और महिला को किसने निर्देशित किया, इसका कोई पुख्ता प्रमाण पेश नहीं किया जा सका। मुख्य साक्ष्य (बम ले जाने वाली महिला) की मौत के बाद पुलिस कनेक्टिंग एविडेंस जुटाने में नाकाम रही।

​क्या था पूरा मामला?

  • ​23 जनवरी 2015 को आरा सिविल कोर्ट परिसर उस समय दहल उठा था, जब कुख्यात अपराधी लंबू शर्मा को पेशी के लिए लाया गया। एक महिला, नगीना देवी, अपने पास बम छिपाकर कोर्ट परिसर में घुसी थी। जैसे ही कैदी वाहन हाजत के पास पहुंचा, महिला के पास मौजूद बम में जोरदार धमाका हुआ।
  • ​इस विस्फोट में नगीना देवी की मौके पर ही मौत हो गई।
  • ​सुरक्षा में तैनात जवान अमित कुमार शहीद हो गए और करीब 18 लोग घायल हुए थे।
  • ​अफरा-तफरी का फायदा उठाकर लंबू शर्मा समेत दो कैदी फरार हो गए थे।

​निचली अदालत का फैसला

​20 अगस्त 2019 को आरा की एडीजे-3 कोर्ट ने लंबू शर्मा को फांसी और अखिलेश उपाध्याय, नईम मियां, चांद मियां, प्रमोद सिंह सहित 8 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, पूर्व विधायक सुनील पांडेय समेत तीन को तब भी साक्ष्य के अभाव में बरी किया गया था।
​अब हाई कोर्ट ने माना है कि आरोपियों के खिलाफ कठोर सजा बनाए रखने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं हैं। चूंकि सभी आरोपी पिछले 9 सालों से जेल में बंद हैं, इसलिए 2 साल की नई सजा की अवधि पूरी होने के आधार पर उन्हें जल्द ही रिहा कर दिया जाएगा।

​जांच के घेरे में रहे थे बाहुबली

​इस केस की जांच के दौरान उत्तर प्रदेश के बाहुबली बृजेश सिंह और पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी के नाम भी चर्चा में आए थे, लेकिन उनके खिलाफ भी ठोस सबूत नहीं मिलने के कारण पुलिस चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई थी। अंततः, अभियोजन पक्ष के कमजोर साक्ष्यों ने इस हाई-प्रोफाइल मामले का रुख बदल दिया।