पटना। राजधानी की सड़कों पर बुधवार को उस समय अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली, जब हजारों लोग UGC रेगुलेशन और आरक्षण की मांग को लेकर राजभवन मार्च पर निकले। आइसा और जय भीम जैसे संगठनों के बैनर तले जुटे इस प्रदर्शन में भीड़ तो बड़ी थी, लेकिन मकसद को लेकर भारी भ्रम दिखा। हैरानी की बात यह रही कि प्रदर्शन में शामिल अधिकतर लोगों को यह तक नहीं पता था कि UGC क्या है।
सवालों से बचती महिलाएं
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं से जब UGC या उनके आने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने बात करने के बजाय घूंघट से अपना मुंह छिपा लिया। कई पुरुषों ने भी कैमरे पर सवाल टालते हुए कहा कि वे कुछ नहीं बता पाएंगे। प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसे यह जानकारी ही नहीं थी कि वे किस नीति या कानून के विरोध में आए हैं।
UGC के मंच से जमीन और आधार कार्ड की गूंज
भले ही यह प्रदर्शन शिक्षा और आरक्षण (SC-ST, EBC-BC के लिए 65%) के मुद्दों पर बुलाया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली। प्रदर्शनकारी माला देवी ने कहा, हमें हमारी जमीन से भगाया जा रहा है, हम कहां जाएंगे? वहीं, कुछ लोग इस बात से परेशान दिखे कि उनसे और उनके बच्चों से आधार कार्ड मांगे जा रहे हैं।
शिक्षा नहीं, देसी अंग्रेजों से है लड़ाई
आदिवासी समाज से आए अरुण गुड्डू ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि उनकी लड़ाई उन ‘देसी अंग्रेजों’ से है जो उन्हें उनकी पुश्तैनी ज़मीन से बेदखल कर रहे हैं। लखी राम जैसे बुजुर्गों का कहना था कि वे 100 साल से जिस खेत को जोत रहे हैं, अब उसे छीना जा रहा है। उनके लिए UGC एक अनजान शब्द था, उनकी असली चिंता रोज़ी-रोटी और सिर छिपाने की जगह थी।
महंगाई और सरकार के खिलाफ गुस्सा
प्रदर्शन में महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा भी हावी रहा। चेतन नामक प्रदर्शनकारी ने कहा कि सरकार ने मजदूरी बंद करवा दी है और गरीबों का खून चूसा जा रहा है। प्रदर्शन का समर्थन कर रहे गार्जियन और कार्यकर्ताओं ने इसे ब्राह्मणवाद और जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई बताया, जबकि कुछ ने साफ कहा कि वे मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के संकल्प के साथ आए हैं।
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