Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

सरकार की जेब पर बोझ

न जाने सरकार खुद का एक नया हेलीकाप्टर क्यों नहीं खरीद लेती? सूबे की सरकार बरसो से किराए के हेलीकाप्टर के भरोसे बैठी है। मौजूदा सरकार ने दिसंबर 2023 से फरवरी 2026 तक की स्थिति में करीब 118 करोड़ रुपया किराए के हेलीकाप्टर पर खर्च किया है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के वक्त से अब तक का जोड़ निकाला जाए, तो किराए के हेलीकाप्टर पर ही करीब चार सौ करोड़ रुपए ये ज्यादा खर्च कर दिया गया है। इतने पैसों से सरकार चार-पांच हेलीकाप्टर खरीद लेती। फिजूलखर्ची रोकने सरकार तरह-तरह के जतन के दावे करती है, मगर मालूम नहीं हेलीकाप्टर पर खर्च के चढ़ते मीटर की ओर सरकार का ध्यान क्यों नहीं जा रहा? जनता से जुटाए गए पैसों से इतनी खर्चीली उड़ान ठीक नहीं है। हेलीकाप्टर खरीदी पर सियासत गर्माती रही है। अगर खरीदी की प्रक्रिया में दो-चार सियासी बयान दर्ज हो भी गए, तो भी कोई बात नहीं। कम से कम सरकार के खजाने की गर्माहट तो ठंडी हो जाएगी। सरकार को दूर की कौड़ी चलनी चाहिए और फौरन एक नया हेलीकाप्टर खरीद लेना चाहिए। सरकार की जेब पर पड़ रहा बोझ कम हो जाएगा। हरियाणा की भाजपा सरकार ने साल भर पहले ही 80 करोड़ रुपया का नया हेलीकाप्टर खरीद लिया है। हरियाणा सरकार के बजट और छत्तीसगढ़ सरकार के बजट में कोई बड़ा फासला थोड़े ही है।

पॉवर सेंटर: सहयोग… बेहाल कांग्रेस… निजी हथियार… आहट… पोस्टिंग… – आशीष तिवारी

जोखिम

करीब दो महीने पहले की बात है। बस्तर में राष्ट्रपति के कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे राज्यपाल और मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर में सवार होने वाले थे। हेलीकॉप्टर के एक तरफ के दरवाजे से दोनों बैठ चुके थे। तीसरा व्यक्ति जैसे ही चढ़ने लगा मुख्यमंत्री के ओएसडी ने तुरंत शिष्टाचार और प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए उसे टोका और कहा- यहां से नहीं, दूसरे दरवाजे से बैठिए, यही प्रोटोकॉल है। इतने में हेलीकॉप्टर का अटेंडेंट सक्रिय हुआ और उसने कहा- कोई बात नहीं, आप इसी दरवाजे से बैठ जाइए, लेकिन ओएसडी अपने तर्क पर अड़े रहे। उन्होंने सवाल किया- प्रोटोकॉल भी कोई चीज होती है या नहीं? तभी सच्चाई सामने आई। मालूम चला कि हेलीकॉप्टर का दूसरा दरवाजा खराब था और उसे जुगाड़ से बंद किया गया था। जिस राज्य में दो-दो हेलीकॉप्टर हादसों की यादें आज भी ताजा हैं, वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री की सुरक्षा के साथ इस तरह का खिलवाड़ देख हर कोई सन्न रह गया। सुरक्षा में तैनात अधिकारी तुरंत हरकत में आए और तय हुआ कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री सड़क मार्ग से बस्तर जाएंगे। इसी फरवरी में गौरेला-पेंड्रा दौरे के दौरान मुख्यमंत्री को लेकर उड़ रहा हेलीकॉप्टर निर्धारित स्थान के बजाय कहीं और उतार दिया गया था। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। आखिर यह हो क्या रहा है? कभी हेलीकाप्टर के दरवाजे जवाब दे रहे हैं, तो कभी दिशा। सूबे में भले ही शराब से राजस्व बढ़ रहा हो, लेकिन क्या अब लापरवाही का नशा हेलीकाप्टर तक पहुंच गया है? यह हाल तब है जब देश में हेलीकॉप्टर हादसों में जान गंवाने वाले नेताओं की सूची कम छोटी नहीं है। वाई.एस.आर. रेड्डी, जी.एम.सी. बालयोगी, दोरजी खांडू और ओ.पी. जिंदल जैसे कई नाम इसमें शामिल हैं। इतिहास को नजरअंदाज करना सबसे बड़ा जोखिम है। बेहतर यही होता है कि उससे सबक ले लिया जाए न कि उसे दोहराने की जमीन तैयार की जाए। मगर हैरानी की बात यह है कि शायद सरकारों में जोखिम को एक घटना नहीं, बल्कि आदत की तरह मान लिया जाता है।

पॉवर सेंटर : अफीम… नई प्रजाति… ब्यूटी पार्लर… जन्मदिन और कलेक्टर… हलचल… सिद्धांतों का बैरियर…. बाबा जी का ठुल्लू…. – आशीष तिवारी

किस्सा

रमन सरकार के दिनों की बात है। बस्तर के दौरे से लौटते वक्त सरकारी हेलीकाप्टर के आटो पायलट मोड ने काम करना बंद कर दिया था। हेलीकाप्टर आसमानी ऊंचाई पर था कि अचानक से एक झटके के साथ डेढ़-दो सौ फीट नीचे आ गया। पायलट ने पहले कंट्रोल खोया और फिर बाद में जैसे-तैसे बेकाबू हेलीकाप्टर को अपने कंट्रोल में ले लिया। हेलीकाप्टर में तब के मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, मंत्री केदार कश्यप और ओएसडी रहे विक्रम सिसोदिया सवार थे। हेलीकाप्टर ने जब पुलिस लाइन के हेलीपैड में लैंडिंग की तब जाकर सबने राहत की सांस ली। हेलीकाप्टरों की तकनीकी खराबी के ढेरों किस्से हैं। हर बार बच जाने के बाद गुजर चुका खतरा कहानी लगने लगता है। व्यवस्था ने भी इस जोखिम को स्वीकार करने की बजाए उसे नजरअंदाज करना सीख लिया है। जब तक हादसा नहीं होता, तब तक सब कुछ नियंत्रण में है, यह मान लिया जाता है। बहरहाल सरकार में बैठा चेहरा, सिर्फ एक चेहरा नहीं है। यह एक पद भर नहीं है। राज्य की अमानत भी है और अमानत की हिफाजत अगर संयोग और जुगाड़ पर टिका हो तब क्या ही कहा जाए? लगातार होती लापरवाहियों के बीच हर बार सुरक्षित उतर जाना सफलता नहीं है। यह टल गया एक हादसा है।

पॉवर सेंटर : अफीम…हाय तौबा…रुपया…प्रशासनिक असंतुलन…45 करोड़ का आफर !…ईनाम…- आशीष तिवारी

पॉलिटिकल प्रोटेक्शन

सरकार में कुर्सी पाने का विज्ञान बड़ा ही रोचक है। इसके जानकारों को कम से कम एक तिहाई कुर्सी तो मिल ही जाती है। हाल ही में जब खबर आई थी कि एसडीएम की पिटाई से एक अधेड़ की मौत हो गई, तब यह भी उजागर हुआ था कि एसडीएम रूलिंग पार्टी के एक सांसद का फेवरेट था। सांसद की पैरवी से ही उसने कुर्सी हासिल कर रखी थी। चर्चा यह भी सामने आई कि एसडीएम राज्य की सीमा के दूसरी ओर चल रहे एक ऐसे खदान से वसूली किया करता था, जहां की ट्रकों का रास्ता छत्तीसगढ़ के एक छोटे हिस्से से होकर गुजरता था। अब इस किस्म के एसडीएम की रहनुमाई जब रूलिंग पार्टी का सांसद ही करने लग जाए, तब क्या बच जाएगा? एसडीएम की साख कोई साफ़ सुथरी तो थी नहीं कि वह सांसद की पैरवी का हकदार होता? बहरहाल होना तो यह चाहिए कि रुलिंग पार्टी के नेता, मंत्री, सांसद-विधायकों की सरकार तक पहुंचने वाली पैरवी भरी चिट्ठियों को सार्वजनिक कर दिया जाए। लोगों को यह मालूम होने का हक मिलना चाहिए कि जिन नेताओं को उन्होंने अपने एक वोट से सिर आंखों पर बिठाया है, उनकी पैरवी की चिट्ठियां औसत से कहीं नीचे दर्जे के अफसरों के लिए आखिर कितने मनमाने ढंग से लिखी जाती हैं ! सरकार को भी यह समझना चाहिए कि उसकी साख की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक गिरावट बदनाम अफसरों को दिया जाने वाला पॉलिटिकल प्रोटेक्शन भी है। खैर, अब बात सिर्फ निचले दर्जे तक नहीं रह गई है। पॉलिटिकल प्रोटेक्शन से अब कलेक्टर-एसपी की कुर्सियों का वजन भी हल्का हो गया है। भीषण गर्मी में भी सूट-बूट टंगाए अफसर जायजा के नाम पर दो-चार गांव घूम आए और इसकी तस्वीरों को देखकर सरकार यह मान ले कि सुशासन ज़मीन पर आ गया है, तब क्या ही किया जा सकता है?

पॉवर सेंटर : सिर्फ 12%…चाबी…धरोहर…तरक्की की सीढ़ी…फायदा या नुकसान?…निजी हित …बड़ा खेल…- आशीष तिवारी

महापौर vs निगम कमिश्नर

सूबे की तीन नगर निगमों में महापौर और निगम कमिश्नर के बीच टकराव बढ़ गया है। टकराव की अलग-अलग वजहें हैं। एक निगम में सामान्य सभा की बैठक चल रही थी। किसी बात पर कमिश्नर फट पड़े। उनके मुंह से निकल गया, आप सब थोड़ी बुद्धि का प्रयोग कर लें। यह सुनते ही पार्षदों के कान में आग लग गई। सबने मिलकर कमिश्नर को हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। नियम कहता है कि सामान्य सभा में प्रस्ताव लाकर कमिश्नर को हटाया जा सकता है, मगर मुद्दा यह है कि नगर निगम में विपक्षी दल की सरकार है। अब यह सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा कि कमिश्नर को हटाना है या बचाना है। खैर, एक दूसरे नगर निगम में सफ़ाई ठेके को लेकर महापौर-कमिश्नर आमने-सामने हैं। शहर सरकार में सफाई ठेका भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी इकाईयों में से एक है। शायद दोनों के हितों का टकराव हो, इसलिए एक-दूसरे से टकरा गए हैं। तीसरी कहानी एक ऐसे नगर निगम की है, जहां भाजपाई महापौर ने निगम कमिश्नर को कारण बताओ नोटिस दे दिया है। हालांकि जानकार बताते हैं कि महापौर, कमिश्नर को इस किस्म का नोटिस नहीं दे सकता है। यह अधिकार जीएडी का है या फिर नगरीय प्रशासन सचिव का। फिर भी रूलिंग पार्टी के महापौर है, इतना प्रिविलेज तो बनता है।

पॉवर सेंटर: टूटती गरिमा… कलेक्टरों की भूमिका… मेंटरशिप… दृष्टांत… हल्ला… शैडो… – आशीष तिवारी

बदलाव

मंत्रिमंडल में बदलाव की चर्चा की चिंगारी खूब ज़ोर शोर से फैल रही है। बदलाव की सीढ़ियां कहां जाकर खत्म होंगी फ़िलहाल यह मालूम नहीं है। यह केवल तीन लोग ही जानते होंगे। पहले दो, नंबर वन और नंबर टू के नाम से देश में चर्चित हैं और इस कड़ी में तीसरे नंबर पर जो शख्स हैं, वह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। फ़िलहाल तीनों का जोर इस वक्त दिगर राज्यों में चल रहे चुनावी अभियान पर है। चुनाव के नतीजे मई में आएंगे। ज़ाहिर है, इसके बाद हलचल तेज होगी। ज़्यादातर मंत्रियों की साख बेपटरी हो गई है। पटरी पर लाए जाने के लाख जतन के बावजूद कुल जमा हासिल कुछ नहीं आ रहा। सरकार को नतीजे देने हैं। सत्ता के सवा दो साल बीत गए हैं। काम दिखाने के लिए महज़ डेढ़ साल का वक्त बच गया है। इसके बाद बचा खुचा वक्त राजनीतिक दांव पेंच का होगा। फिर चुनाव सिर पर आ जाएगा। मौजूदा चेहरों के बूते सत्ता में वापसी का इरादा ‘दूर के ढोल सुहाने लगते हैं’ वाली कहावत की तरह है। बहरहाल संभावित बदलाव की एक लकीर खींच दी गई है, लेकिन अब संकेत यही है कि उस अधूरी लकीर को मई के बाद आगे बढ़ाया जाएगा। कुछ नए बाहर जाएंगे और कुछ पुराने भीतर आएंगे। अब तक की चर्चा में तो कम से कम यही सुना गया है।