
सहयोग
राजनीति में ‘सहयोग’ शब्द बड़ा पवित्र माना जाता है, मगर यह शब्द व्यवहार में आते-आते इतना लचीला हो चुका होता है कि हर कोई इसे अपने हिसाब से समझ लेता है। इन दिनों एक महिला विधायक इसी ‘सहयोग’ शब्द की नई परिभाषा से जूझ रही हैं। बात बिल्कुल सीधी है, लेकिन संकेत टेढ़े-मेढ़े हैं। एक आला नेता हैं, जो बार-बार महिला विधायक को संदेश भेजते हैं कि तुम मुझसे बात नहीं करती। सहयोग नहीं करती। फिर कैसे सोचती हो कि मैं तुम्हें सहयोग करूंगा? अब यह सहयोग किस प्रकार का है। इसकी कोई आधिकारिक गाइडलाइन नहीं है, लेकिन इशारों की भाषा राजनीति में हमेशा से स्पष्ट रही है। महिला विधायक असमंजस में नहीं हैं। वह सब समझ रही हैं। वह यह बखूबी जानती हैं कि राजनीति में कहीं गई बातों का अर्थ खुद चलकर सामने आ जाता है, जिसे बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। यहां नेताजी के शब्द कम हैं, मगर अपेक्षाएं ज्यादा हैं और अपेक्षाएं भी ऐसी कि जिनका कोई लिखित प्रस्ताव नहीं है। बस अनकही शर्त है। नेता जी का तर्क बड़ा सीधा है। सहयोग दो और सहयोग लो। यह एक तरह का राजनीतिक लेन-देन है। महिला विधायक की परेशानी बस यही है कि वह ‘सहयोग’ के इस नए गणित में फिट नहीं बैठ रहीं हैं। उन्हें लगता है कि उनकी राजनीति काम से चलेगी, जबकि नेताजी मानते हैं कि सिस्टम अब ‘सहयोग’ से चलने लगा है। उनके इसी सहयोग की भावना से उनकी पार्टी अधर में लटक गई है।
बेहाल कांग्रेस
ओडिशा में कांग्रेस की टिकट पर जीत कर आईं एक मुस्लिम विधायक ने राज्यसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है। ओडिशा का जिक्र इसलिए क्योंकि वह छत्तीसगढ़ का पड़ोसी राज्य है। वैसे कई और दूसरे राज्यों से भी इस तरह की तस्वीर सामने आई है। इन तस्वीरों ने यह बता दिया है कि अब टिकट और विचारधारा का रिश्ता सिर्फ चुनाव तक सीमित रह गया है। बहरहाल, आइए छत्तीसगढ़ की तस्वीर से रूबरू होते हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भी कई शीर्ष नेता ऐसे हैं, जिनका बाहरी आवरण तो कांग्रेस का ही है, लेकिन भीतर का झुकाव भाजपा की ओर दिखाई देता है। ये नेता पूरी तरह भाजपा में नहीं जाते, क्योंकि उन्हें यह पता है कि उनकी राजनीतिक जमीन कांग्रेस में रहने से ही बची हुई है। यानी उनकी चाहत कांग्रेस के पेड़ की शाखा बने रहने की है, मगर उन्हें छाया भाजपा की चाहिए ! खैर, फिलवक्त कांग्रेस की बुनियाद ऐसे ही कुछ नेताओं पर टिकी हुई दिखती है। जब बुनियाद ही डगमग हो, तो ऊपर का ढांचा स्थिर कैसे रहेगा? यह सवाल अब बार-बार सामने आता है।विधानसभा के हालिया बजट सत्र की ओर झांक आइए। कई मौके ऐसे आए, जब कांग्रेस ने प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय हथियार डाल दिए। पिछली सरकार में स्थिति यह थी कि विपक्ष में बैठी भाजपा के 14 विधायक, सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी के 71 विधायकों पर भारी पड़ जाते थे। अब संख्या के साथ स्थिति भी बदल गई है। कांग्रेस खुद अपने वजन तले दबती दिख रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का सदन में खड़ा होना ही एकमात्र ऐसा क्षण बन जाता है, जब सत्ता पक्ष में कुछ हलचल दिखती है। रही बात नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की तो वह अपनी राजनीतिक सहजता के आगे निकल नहीं पा रहे हैं और वर्तमान राजनीति की प्रकृति अब उस सहजता से कहीं आगे निकल चुकी है। कुछ मंत्रियों को छोड़कर सत्ता पक्ष के ज्यादातर मंत्री कमजोर हैं, बावजूद इसके विपक्ष इस अवसर को भुनाने से बार-बार चूक कर रहा है। विपक्षी विधायक अब घेरते नहीं दिखते, क्योंकि वह अपने-अपने हितों को साधने में व्यस्त हैं। फिलहाल विपक्ष के विरोध की धार कुंद है और अवसरों का उपयोग अधूरा है। कांग्रेस के एक बड़े नेता कहते हैं कि कांग्रेस को कोई हरा नहीं रहा है। वह खुद को हराने की प्रक्रिया में बेहद अनुशासित तरीके से लगी हुई है।
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निजी हथियार
रूलिंग पार्टी के एक विधायक हैं, जिन्होंने अपने संवैधानिक अधिकार को निजी हथियार में बदल लिया है। विधानसभा में उनके सवालों की सूची देख लीजिए। सवा दो साल की सरकार में एक ही विभाग के इर्द-गिर्द इतनी निरंतरता, लगन और निष्ठा से सवाल लगा रहे हैं कि यह बात किसी से छिपी नहीं रह गई कि जनहित में उनका हित निहित है। एक दिन विभाग के मंत्री विधानसभा में होने वाले सवाल-जवाब पर अफसरों से ब्रीफिंग ले रहे थे कि फिर से विधायक का एक सवाल उठ खड़ा हुआ। मंत्री बोल पड़े, ज़रूर इसकी वसूली में कोई दिक़्क़त आई होगी? विधायक के विधानसभा में सवाल पूछने की संवैधानिक शक्ति संदेह के घेरे में खड़ी होने लगी है। हालांकि यह बात और है कि विधायक को इसकी परवाह भी नहीं। वह खुलकर कहते हैं कि भाजपा में टिकट मिलेगी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है, लेकिन पैसा कमाने की गारंटी आज पूरी है। जब आज की गारंटी पक्की है, तो भविष्य की अनिश्चितता पर दांव क्यों लगाया जाए? हाथ में पैसा होगा तो टिकट भी आ ही जाएगी। चुनाव के वक्त यही विधायक थे, जो हाथ जोड़कर लोगों के दरवाजों पर खड़े थे। सड़क, पानी, बिजली, अस्पताल जैसे बुनियादी वादों के साथ। अब वहीं हाथ किसी और गणना में व्यस्त हैं। जिन्होंने वोट दिया था, उनकी बुनियादी जरूरत का वादा आज भी कतारबद्ध है। गाने, बजाने और ढोल पीटने भर से सियासत नहीं हो जाती। सियासत की मजबूत जमीन के लिए लोकतंत्र में ‘लोग’ चाहिए। विधायक के लोभ से ‘लोग’ पीछे छूट रहे हैं। रूलिंग पार्टी को अपने विधायकों की मनमानी देखनी चाहिए।
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आहट
मंत्रिमंडल में बदलाव की आहट बड़ी तेज है। चर्चा है कि पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद सूबे की सरकार में बड़ा फेरबदल होगा। इस फेरबदल की जद में कौन-कौन आ सकता है? फिलहाल यह तय नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि इस संभावित फेरबदल से मंत्रियों की धड़कने बढ़ गई हैं। ज्यादातर मंत्रियों के परफॉर्मेंस रिपोर्ट से आलाकमान संतुष्ट नहीं है। दिल्ली ने मंत्रियों के कामकाज की निगरानी के लिए कई आंखें छोड़ रखी हैं। यहीं आंखें मंत्रियों के उठने-बैठने, सोने-जागने से लेकर हर तरह की हरकत की सीधी रिपोर्ट दिल्ली भेज रही हैं। कौन सा मंत्री कितने गहरा उतर चुका है, ऊपर वालों को सब मालूम है। कुछ मंत्रियों ने मौके की नजाकत भांप ली थी, सो उन्होंने अपने इर्द-गिर्द रहने वाले विवादित किस्म के लोगों से पल्ला झाड़ लिया है। ताकी साख बचाई जा सके। साख बचेगी तो ही कुर्सी बची रहेगी। यह बात उन्हें समय रहते समझ आ गई थी। खैर, फेरबदल से जुड़ी तमाम चर्चाओं में एक चर्चा यह भी है कि एक प्रभावशाली मंत्री को केंद्रीय संगठन में बड़े ओहदे पर लिया जा सकता है। ऊंची उड़ान उड़ रहे कुछ मंत्रियों का पर कतर दिया जाना लगभग तय है।
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पोस्टिंग
सूबे की प्रशासनिक बिरादरी में ऊपर से नीचे तक बदलाव होना है। मंत्रालय में कई सेक्रेटरियों के विभाग बदले जाने हैं। कुछ जिलों में कलेक्टरों को दो साल हो गया है। सरकार अब उनकी भी नई पोस्टिंग करेगी। कुछ ढीले-ढाले कलेक्टर भी इस बदलाव की जद में आ जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं। सरकार अपनी साख पर फोक्स्ड है। प्रशासनिक कसावट लाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सरकार ने सुशासन का नारा बुलंद किया हुआ है। खैर, सुना है कि शासन ने दो साल से एक ही जगह तैनात अफसरों की सूची निकाल ली है। जाहिर है, टेबल पर रखने के लिए तो यह नहीं निकाली गई होगी। इन अफसरों को इधर से उधर किया जाएगा। बदलाव टुकड़ों में होगा या एक झटके में यह तय नहीं है। सूबे में साय सरकार के आते ही जब 89 अफसरों की सूची जारी हुई थी। तब बड़ा विवाद हुआ था। खूब आरोप लगे थे। इसलिए सरकार कदम फूंक-फूंक कर काम कर रही है। पिछले दिनों एक चौंकाने वाली पोस्टिंग हुई। पीएमओ की पसंद पर जनसंपर्क आयुक्त रवि मित्तल को दिल्ली बुला लिया गया है। सरकार उनकी जगह किसकी नियुक्ति करेगी? यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। चर्चा में कई नाम हैं, लेकिन किसी एक नाम पर मुहर लग गई हो ऐसा भी नहीं है। सरकार की छवि बनाने और बिगड़ती छवि को सुधारे जाने के लिहाज से ये अहम पद है, जाहिर है काफी सोच विचार कर इस पद पर किसी अफसर की पोस्टिंग की जाएगी।
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