Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

अफीम

दुनिया ने दो अफीम युद्ध देखे हैं। प्रथम अफीम युद्ध (1839 -1842) और द्वितीय अफीम युद्ध (1856 -1860) और तीसरा अफीम युद्ध छत्तीसगढ़ में छिड़ गया है। छत्तीसगढ़ में छिड़ा यह युद्ध राजनीतिक हैं, जहां आरोप-प्रत्यारोप हैं। बयानबाजी के हथियार और गोले छोड़े जा रहे हैं। फिर भी युद्ध तो युद्ध ही है। भले ही वह राजनीतिक युद्ध ही क्यों न हो? खैर, दुर्ग के बाद जब सरगुजा से खबर आई कि वहां के खेतों ने भी अफीम उगलने शुरू किए हैं, तब खेत के मालिक की खोजबीन शुरू हुई। मालूम चला कि सीधे-सीधे तो नहीं, लेकिन आड़े तिरछे रास्ते से भाजपा नेता का संरक्षण मिल ही गया है। अब इस बात पर कितनी सच्चाई है यह तो नहीं पता, लेकिन हल्ला मच गया कि एक सांसद से जुड़े लोग अफीम की खेती कर रहे थे। बहरहाल अफीम को लेकर जब दुनिया में दो बड़ी लड़ाईयों के प्रमाण मौजूद हैं, तब सरकार को भी लगा होगा कि हस्तक्षेप जरूरी है, सो हुकूमत ने पूरे राज्य में जमीन खोदने का निर्देश कलेक्टरों को जारी कर दिया है। अब प्रशासन खेत दर खेत जाकर अफीम ढूंढ रहा है। खैर, पिछले दिनों विधानसभा में भाजपा विधायकों की टोली के बीच अफीम की चर्चा चल रही थी। एक विधायक ने डंके की चोट पर कहा कि इस राज्य में अगर किसी को यह नहीं मालूम की अफीम कहां-कहां उगाई जा रही है? तो फिर वह इस राज्य को जानता ही नहीं। दूसरे ने पूछा- आप ही बताइए कि अफीम कहां उगाई जा रही है? इस पर उन्होंने तपाक से कहा, सीमावर्ती जिलों के ऐसे इलाकों में जहां दो राज्य की सीमाओं के बीच नदी है। अफीम की ज्यादातर खेती ऐसे इलाकों में ही है। शहरों के बीच मिलने वाली अफीम की खेती तो बेहद मामूली है। जब सूबे के भाजपा विधायक को यह मालूम है, तो फिर ऐसे में भला कलेक्टरों को दूरबीन पकड़ाकर अफीम की खेती ढूंढने की जिम्मेदारी देने की बजाए यह कहना चाहिए कि राज्य का नक्शा लेकर फलाने विधायक के साथ बैठ जाएं। सब कुछ मिनटों में पता चल जाएगा।

पॉवर सेंटर : अफीम…हाय तौबा…रुपया…प्रशासनिक असंतुलन…45 करोड़ का आफर !…ईनाम…- आशीष तिवारी

नई प्रजाति

सरकार अफीम ढूंढ रही है। अफीम ढूंढने की जिम्मेदारी सूबे के कलेक्टरों को दी गई है। कई जिलों के कलेक्टरों ने सख्ती बरती है। जमीन खोदी जा रही है और अफीम ढूंढी जा रही है। खैर, चंद अफसरों की मौजूदगी में हुई किस्सागोई में यह बात उठी कि ब्यूरोक्रेसी की नई पौध में कुछ चुनिंदा फूल ऐसे खिल रहे हैं, जो नशे के शौकीन है। अफीम तो अफीम, मार्फिन, गांजा, भांग, कोकीन, चरस, एलएसडी जैसे न जाने कितने किस्म के नशे का शौक फरमाते हैं। एक अफसर ने कहा, ब्यूरोक्रेट्स भी आखिर इस समाज का ही हिस्सा हैं। उन्हें इन सबसे अलग कैसे माना जा सकता है। शौक बड़ी चीज है। इस पर उन्होंने हंसते हुए कहा कि तीन-चार जिलों के कलेक्टरों के बंगलों से गुजर जाइए वहां बहती हवा के नाक में घुलने भर से यह मालूम चल जाएगा कि कौन सा कलेक्टर किस नशे का शौक फरमाता है। एक तीसरे अफसर जो शांत मिजाज के साथ सब कुछ सुन रहे थे, उन्होंने धीरे से कहा- ब्यूरोक्रेसी की नई पौध में कुछ ‘अफीमची’, ‘गंजेड़ी’, ‘भंगेड़ी’, ‘बेवड़ा’ जैसी नई जातियां उभर रही हैं। यह अब स्टेटस सिंबल बन गई है। इसे बुरी निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए। चौथे ने सिगरेट सुलगाई और कहा, सब फिजूल की बातें करने में वक्त जाया कर रहे हो। अफीम ढूंढो अफीम।

पॉवर सेंटर : सिर्फ 12%…चाबी…धरोहर…तरक्की की सीढ़ी…फायदा या नुकसान?…निजी हित …बड़ा खेल…- आशीष तिवारी

ब्यूटी पार्लर

उस दिन जिले में प्रशासनिक चुस्ती-फुर्ती का ऐसा ऐतिहासिक उदाहरण देखने को मिला कि लोगों की वर्षों पुरानी जिज्ञासा का समाधान हो गया। लोग अक्सर पूछा करते थे कि आखिर प्रशासन इतनी तेजी से कब काम करता है। उस दिन लोगों को इसका व्यावहारिक उत्तर भी मिल गया कि, जब समस्या ब्यूटी पार्लर स्तर की हो। घटना देखने में बेहद साधारण थी, लेकिन उसका प्रशासनिक महत्व असाधारण था। कलेक्टर साहब की धर्मपत्नी को ब्यूटी पार्लर जाना था। सामान्य परिस्थितियों में यह एक घरेलू कार्यक्रम माना जाता, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से यह मामला अचानक जिले की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया। दुर्भाग्य से पार्लर वाले को यह जानकारी नहीं थी कि उसके छोटे से पार्लर को आज जिले का प्रशासनिक गौरव प्राप्त होने वाला है। वह बेचारा रोज की तरह पार्लर बंद करके घर चला गया। उसे क्या मालूम था कि उसका यह साधारण निर्णय प्रशासनिक हलचल का कारण बनने वाला है। आखिरकार कलेक्टर साहब ने निगम कमिश्नर को फोन लगाया। उनका आदेश संक्षिप्त और स्पष्ट था, पार्लर वाले को तुरंत ढूंढा जाए। बस फिर क्या था। प्रशासनिक तंत्र बिजली की गति से सक्रिय हो गया। फोन घनघनाने लगे। अफसरों के कदम तेज हो गए। मानो शहर की सबसे गंभीर समस्या का समाधान ढूंढा जा रहा हो। जिस शहर में आम आदमी अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए महीनों दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है, उसी शहर में एक बंद ब्यूटी पार्लर को खुलवाने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला अद्भुत तत्परता के साथ मैदान में उतर आया था। उस दिन लोगों ने प्रशासन की कार्यशैली का एक नया अध्याय पढ़ा। लोगों को यह भी समझ आ गया कि प्रशासन की असली ताकत कहां खर्च होती है। दरअसल प्रशासनिक अमले की प्राथमिकताएं भी समस्या के स्तर से तय होती हैं और इस मामले में समस्या का स्तर स्वाभाविक रूप से बहुत ऊंचा था, क्योंकि कलेक्टर की धर्मपत्नी को ब्यूटी पार्लर जाना था। जिले में अस्पतालों की बदहाली, सड़कों पर गड्ढे, स्कूलों की दुर्दशा, पानी की किल्लत वगैरह-वगैरह ये सब समस्याएं प्राथमिकता की सूची में शायद कहीं नीचे होती होंगी। आखिर ये आम लोगों की समस्याएं हैं, इनमें वह प्रशासनिक आपातकालीन चमक कहां जो एक बंद ब्यूटी पार्लर से कलेक्टर की पत्नी को मिल सकती थी। कुल मिलाकर यह घटना प्रशासनिक दक्षता का एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है। सुशासन सरकार को इस अनूठे प्रयोग पर कम से कम एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन तो जरूर देख लेना चाहिए। इससे यह समझने में बड़ी मदद मिलेगी कि प्रशासनिक तंत्र वास्तव में कब, कैसे और कितनी अद्भुत गति से काम कर सकता है।

पॉवर सेंटर: टूटती गरिमा… कलेक्टरों की भूमिका… मेंटरशिप… दृष्टांत… हल्ला… शैडो… – आशीष तिवारी

जन्मदिन और कलेक्टर

पुराने भाजपा नेताओं की एक पुरानी परंपरा है। वह अपना जन्मदिन गौशाला में मनाते हैं। जिले के एक वरिष्ठ भाजपा नेता का भी जन्मदिन था। लिहाजा परंपरा का निर्वाह करते हुए गौशाला में ही कार्यक्रम रखा गया। संयोग से जिस वक्त गौशाला में जन्मदिन का कार्यक्रम तय था, ठीक उसी समय कलेक्टर कार्यालय में एक अहम प्रशासनिक बैठक भी निर्धारित थी। समय तय था। एजेंडा तय था। बैठक में विधायक की मौजूदगी भी थी। लिहाजा पूरा प्रशासनिक अमला समय से पहले ही बैठक कक्ष में पहुंच चुका था। फाइलें खुल चुकी थीं। अधिकारी अपनी-अपनी कुर्सियों पर विराजमान थे और सबकी नजर दरवाजे पर कलेक्टर साहब के इंतजार में टिकी थीं, लेकिन कलेक्टर साहब कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। शुरुआत में लोगों ने सोचा कि शायद रास्ते में होंगे, अभी आते होंगे। मगर मिनट दर मिनट बीतने लगे। लोग ढूंढने लगे, आखिर साहब हैं कहां? किसी ने पता लगाया तो मालूम पड़ा कि कलेक्टर साहब इस समय गौशाला में हैं। गायों के बीच। वह भाजपा नेता के जन्मदिन कार्यक्रम का हिस्सा बने हुए हैं। यह खबर जैसे ही बैठक कक्ष तक पहुंची, वहां बैठे प्रशासनिक अमले के बीच खुसर-फुसर शुरू हो गई। दरअसल प्रशासनिक अमला शायद इस बात से पूरी तरह वाकिफ नहीं था कि कलेक्टर साहब दूर की कौड़ी चलने वाले खिलाड़ी माने जाते हैं। उन्हें बखूबी मालूम है कि कब, कहां और कितनी देर तक दिखाई देना है। किस मंच पर मौजूदगी ज्यादा मायने रखती है और किस जगह थोड़ी देर की देरी चल सकती है। अपने चंद वर्षों के प्रशासनिक अनुभव में उन्होंने यह बात समझ ली है कि सिर्फ योग्यता के भरोसे सही कुर्सी तक पहुंचना हमेशा संभव नहीं होता। प्रशासनिक अधिकारी की योग्यता में राजनीतिक समझ का हल्का सा रंग भी जरूरी होता है। शायद इसी समझ के चलते उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं भी साफ कर ली हैं कि बैठक थोड़ी देर रुक सकती है, लेकिन राजनीतिक मंच पर अनुपस्थिति नहीं। कलेक्टर साहब का तजुर्बा उन्हें यह भी सिखा चुका है कि नियम-कायदों की मोटी किताबें पढ़ लेना ही प्रशासनिक दक्षता की अंतिम कसौटी नहीं है। उतनी ही बारीकी से राजनीतिक कैलेंडर पढ़ना भी जरूरी है। किस नेता का जन्मदिन कब है। किसके माता-पिता की बरसी है। कहां नाती-पोते का मुंडन है। किसके यहां शादी-ब्याह का कार्यक्रम है। इन सब तारीखों को याद रखना भी अब प्रशासनिक दक्षता का हिस्सा माना जाने लगा है।

पॉवर सेंटर: चर्चा में आईजी साहब… स्पष्टीकरण … एफआईआर… जंगलराज… कलेक्टर के नाम पर वसूली… मौसम… – आशीष तिवारी

हलचल

पिछले दिनों एक दिलचस्प घटना घटी। एक तेजतर्रार छवि वाली वरिष्ठ आईएएस अफसर अचानक अपने मातहत विभाग के दफ़्तर पहुंच गईं। दफ़्तर में हलचल मच गई। आम तौर पर ऐसे दौरे किसी बैठक, निरीक्षण या फटकार के लिए होते हैं, लेकिन इस बार वजह कुछ अलग थी। दरअसल मामला विधानसभा के एक सवाल का था। सवाल का जवाब तैयार कर भेजने की ज़िम्मेदारी जिस अधिकारी की थी, वे छुट्टी पर थे। विधानसभा सत्र के दौरान अफसरों की छुट्टियां आम तौर पर रद्द कर दी जाती हैं, लेकिन सरकारी तंत्र में ‘आम तौर पर’ और ‘असल में’ के बीच अक्सर लंबा फासला होता है। खैर, सुना है कि वरिष्ठ आईएएस ने महकमे के दफ़्तर पहुंचकर खुद ही जवाब तैयार किया। वैसे कागजों में हमारा प्रशासन बेहद व्यवस्थित दिखता है। हर काम के लिए अधिकारी, हर अधिकारी के लिए जिम्मेदारी और हर जिम्मेदारी के लिए नियम। फिर भी ज़्यादातर मौकों पर इस तरह की घटनाएं घट जाती हैं, जब जिम्मेदारी सिर्फ काम करने वालों के बीच सिमटकर रह जाती है। वरिष्ठ आईएएस जिम्मेदारी समझती थीं, सो उन्हें संकोच नहीं हुआ।बहरहाल सरकारी तंत्र में अधिकारी-कर्मचारियों की भीड़ बहुत है, लेकिन हकीकत यह है कि तंत्र का पहिया व्यक्तिगत जिम्मेदारी से घूमता है। कुछ के हिस्से कुर्सी का भार है और कुछ के हिस्से जिम्मेदारियों का।

पॉवर सेंटर: बंद मुठ्ठी की सत्ता… जूतमपैजार… विकेट गिरना तय… एसपी की पीड़ा… बुरा मान गए नेताजी… – आशीष तिवारी

सिद्धांतों का बैरियर

सत्ता में कुछ लोग होते हैं जो शराब के नशे में, सट्टा खेलकर, कोयले की कालिख, अवैध रेत से साफ करने की कोशिश करते हैं। कोयले की कालिख है जनाब। इतनी आसानी से साफ नहीं होती। पूर्ववर्ती सरकार के दामन पर यह आरोप सीधा-सीधा था। इसलिए छापे डले। जांच हुई। कुछ लोगों को सलाखों के उस पार भेज दिया गया। आरोप अब भी हैं, लेकिन इन आरोपों की लकीर सीधी सपाट नहीं है। टेढ़ी-मेढ़ी है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। बात कुछ यूं है कि भाजपा के एक सांसद पर कोयले की कालिख के छींटे दिखाई दे रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस की पारंपरिक लड़ाई अचानक साझेदारी में बदलती दिख रही है। कहानी में एक तरफ भाजपा के सांसद का नाम उछल रहा है और दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता के संरक्षण की चर्चा है। यानी मंच पर विरोध और जमीन पर सहयोग एक साथ। वैसे भी राजनीति का यह पुराना, लेकिन आजमाया हुआ खेल है। चर्चा जोरों पर है कि सांसद की जेब भारी हो रही है। कोयले की गाड़ियों का मामला जब-जब उठता है तब-तब रास्ता साफ रखने के लिए उनके सिद्धांतों का बैरियर खुद ब खुद उठ जाता है। मालूम यह भी चला है कि संघ और संगठन ने सांसद के कारनामों पर नजरें जमा ली है।

पॉवर सेंटर: जो उखाड़ना है, उखाड़ लो… गाली… वर्चस्व की लड़ाई… उबड़ खाबड़… मूषक विधायक… – आशीष तिवारी

बाबा जी का ठुल्लू

भाजपा के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाकर सबकी नजरें खींच ली कि राज्य के विश्वविद्यालयों में तीन को छोड़कर कहीं भी छत्तीसगढ़ी कुलपति नहीं है। अजय चंद्राकर का सवाल सीधा-सीधा था कि क्या छत्तीसगढ़ में मेधा नहीं है? रविशंकर विश्वविद्यालय, कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय, आयुष विश्वविद्यालय, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, संगीत विश्वविद्यालय, महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, कामधेनु विश्वविद्यालय, अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय, सुंदरलाल शर्मा विश्वविद्यालय, नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, ये सभी राज्य सरकार के अधीन आते हैं। फिर भी इनमें गैर छत्तीसगढ़ी कुलपतियों का कब्जा है। राज्य के पांच विश्वविद्यालयों के कुलपति उत्तरप्रदेश से आते हैं। दो विश्वविद्यालय के कुलपति हरियाणा से हैं। दो विश्वविद्यालय के कुलपति मध्यप्रदेश से और एक विश्वविद्यालय के कुलपति ओडिशा से हैं। सवाल वही है क्यों भाई? क्या राज्य कायदे का कुलपति तक तैयार नहीं कर पा रहा है? जिससे हमे कुलपति आयात करने की नौबत आन पड़ी है। शायद इसलिए ही अजय चंद्राकर यह कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया वाले लोग ऐसी हमको बाबा जी का ठुल्लू पकड़ा दिए हैं। सरकार अब इस किस्म के ठुल्लूओं से बाहर आ जाए, तो ही अच्छा है। वैसे भी अगर यह सब बातें अगर विपक्ष का कोई विधायक कहता तो बात कुछ और होती। ख़ुद के विधायक कह रहे हैं, तो सरकार ए हुज़ूर को नजरें इनायत करनी ही चाहिए।