Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

पुलिस कमिश्नरेट (1)

रायपुर में पुलिस कमिश्नरेट लागू हो रहा है। सरकार की यह घोषणा सुधार का आभास देती है, पर इसकी शर्ते पढ़ते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि दरअसल यह सिर्फ एक सुधार नहीं, बल्कि सीमा निर्धारण है। यह तय करने की कवायद है कि पुलिस कहां तक देख सकती है और कहां तक नहीं। बहरहाल कमिश्नरेट का मूल विचार यह है कि कानून व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णय के बीच की दूरी घटे। पुलिस कमिश्नरेट के लागू हो रहे माडल को देखकर पुलिस बिरादरी यह मान रही है कि रायपुर माडल में यह दूरी घटाई नहीं गई है। पुलिस को वहीं काम सौंपा गया है, जो वह पहले भी कर रही थी। एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि शराब, हथियार, जमीन जैसे मामले जिनसे अपराध जन्म लेते हैं, उन पर पुलिस के अधिकार को मजबूत करने की मांग पर सरकार ने कह दिया कि यह सब सिविल नेचर के काम हैं। सरकार ने अपने तर्क में कह दिया है कि पुलिस के पास डंडा है और डंडे से न्याय डर जाएगा। खैर, मध्यप्रदेश माडल को अंतिम सत्य मान लिया गया है। भुवनेश्वर और कटक का उदाहरण संदर्भ नहीं बन पाया, क्योंकि वहां अधिकार दिए गए हैं और इधर सूबे में सरकार को लगता है कि पुलिस को अधिकार देना हमेशा जोखिम भरा होता है। रायपुर को कमिश्नरेट मिला है, पर यह वह कमिश्नरेट नहीं है, जिसकी मांग पुलिस बिरादरी ने की थी। पुलिस बिरादरी कह रही है कि नाम नया है, मगर ढांचा पुराना है। पुलिस बिरादरी की चर्चा के केंद्र में यह बात है कि कानून व्यवस्था की चौकसी के इरादे से सरकार शेर तो बिठा रही है, मगर बगैर दांत का शेर क्या ही शिकार कर लेगा?

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सिक्के के दो पहलू (2)

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। मगर पुलिस कमिश्नरेट के सिक्के पर एक ही तरफ इतनी चमक है कि दूसरा पहलू थोड़ा धुंधला पड़ता दिख रहा है। लाठी पुलिस की पहचान है और प्रशासनिक बिरादरी ने सरकार को यह बात बखूबी समझा दी है। पुलिस बिरादरी ने भी हद से ज्यादा हिम्मत दिखा दी थी। पुलिस की कमेटी ने कलेक्टरों के हिस्से आने वाले 22 कानूनों के अधिकार मांग लिए थे, जबकि मध्यप्रदेश के पुलिस कमिश्नरेट के जिस माडल को अपनाया जा रहा है, वहां भी कलेक्टरों के महज 9 कानूनी अधिकार कमिश्नर को सौंपे गए हैं। पुलिस की कमेटी के सुझावों पर प्रशासनिक बिरादरी की कैंची खुद ब खुद चल गई। प्रशासनिक महकमे ने यह कह दिया कि लोकतांत्रिक व्ययवस्था के लिए यह ठीक नहीं है भाई। थोड़ा हद में रहो। खैर, सबसे बड़ा डर सिविल नेचर का था। प्रशासनिक बिरादरी ने सरकार को यह समझाया कि जमीन, लाइसेंस, एक्साइज, आर्म्स जैसे मामले नाजुक होते हैं। यहां सिर्फ लाठी से फैसला नहीं होता, यहां दिमाग, धैर्य, दस्तावेज चाहिए होते हैं। जहां दस्तावेज आ जाए, वहां लाठी की उपयोगिता सीमित हो जाती है। यह बात पुलिस को भले न जचे मगर सरकारी व्यवस्था के लिए बेहतर होती हैं। अब जरा कल्पना कीजिए कि एक ही अफसर लाइसेंस भी दे रहा है और उसी लाइसेंस पर डंडा भी चला रहा है, तब कैसा हाल होगा? फिर जमीन से जुड़ा मामला देख लीजिए। जमीन के विवादित मामलों में कोर्ट की तरह सुनवाई होती है। जांच होती है। बयान होते हैं। निर्णय के खिलाफ अपील का प्रावधान होता है। ऐसे में अगर न्याय मांगने वाला पहले ही पुलिस की वर्दी देखकर सहम जाएगा, तब हाल कैसा होगा? इसलिए पुलिस कमिश्नरेट के मसौदे पर सरकारी मुहर लगाते हुए सरकार ने यह तय किया कि पुलिस का काम पुलिसिंग करना और प्रशासन का काम प्रशासन चलाना होगा। सरकार ने पुलिस बिरादरी से कह दिया है कि आप जिम्मेदार तो होंगे, मगर निर्णायक नहीं।

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विदाई

कुछ तो बात होगी, वरना यूं ही कोई इस तरह का फैसला नहीं लेता। एक डिप्टी सीएम के ओएसडी को अचानक बदल दिया गया। ओएसडी भरोसेमंद थे। मंत्री की नजर में काबिल भी। राजदार भी। इतनी खूबियों के बाद भी ओएसडी के बदले जाने की चर्चा प्रशासनिक गलियारे में गूंज रही है। किस्म-किस्म की चर्चा है। कुछ चर्चा बे सिर पैर की भी है। सूबे में मंत्रियों के ओएसडी को बदलने का दौर चल रहा है। हाल ही में एक और मंत्री के ओएसडी और पीए को बदल दिया गया था। एक ओएसडी मंत्री की आंख, कान, नाक सब होता है। ओएसडी की नजर से मंत्री देखते हैं। सुनते हैं और कई चीजों को सूंघ भी लेते हैं। भरोसे का ओएसडी मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाता है। खैर, डिप्टी सीएम के एक ओएसडी की विदाई हो गई और दूसरे आ गए। नए ओएसडी प्रशासनिक अफसरों के संघ के नेता भी हैं। सर्व सम्मति से नेता चुने गए थे। सुनते हैं कि वह योग्य हैं। गहरी समझ है। व्यवहार कुशल हैं। बगैर हल्ला किए बड़े-बड़े काम शांति से कर जाते हैं। किसी को भनक तक नहीं होती। मंत्रियों को इस किस्म के ओएसडी की ही दरकार होती है। जब वह बिलासपुर में नगर निगम कमिश्नर थे और डिप्टी सीएम दिल्ली की संसद में बैठते थे, तब से दोनों के बीच की फ्रीक्वेंसी मिल गई थी। व्यावहारिक तौर पर अब साथ आए हैं। हर बदलाव एक नई तस्वीर दिखाती है। यह तस्वीर कैसी होगी, फिलहाल मालूम नहीं।

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आंखों का महत्व

सूबे की राजनीति में इन दिनों आंखों का बड़ा महत्व हो गया है। कोई आंखें दिखा रहा है, कोई आंखें फेर रहा है, कोई आंखें मूंदकर व्यवस्था चलाने का दावा कर रहा है। मगर सबसे दिलचस्प बात यह है कि सबको लगता है कि जो दिखाया जा रहा है, दरअसल वहीं सही है। अब सरकार के इस आयोग को ही देख लीजिए। सरकारी कागजों में तो यह आयोग एक मंत्री के विभाग के अधीन है, मगर आयोग का अध्यक्ष किसी अदृश्य महाशक्ति की गोद में बैठा दिखता है। अध्यक्ष की नजर में मंत्री की कोई हैसियत ही नहीं है। हालात तब तक सहज थे, जब तक यह विभाग किसी और मंत्री के हिस्से था। तब इस आयोग में मंत्री की अनुपस्थित रूचि ने अध्यक्ष को आयोग की स्वतंत्र सत्ता सौंप दी थी। प्रशासनिक मनोविज्ञान का एक पुराना नियम है, जब राजा घर पर न हो, तब चौकीदार भी खुद को राजा समझने लगता है। आयोग का हाल यही था। फिर सत्ता चक्र बदल गया। जब नए मंत्री आए, तब नियम कानून की किताब उठाकर अपनी मेज़ पर रख ली। आयोग के अध्यक्ष को तब महसूस हुआ कि स्वतंत्रता और मनमानी में बड़ा फर्क है। अब आयोग की निगरानी बढ़ गई और अध्यक्ष की बेचैनी भी। मंत्री कानूनी शतरंज के खिलाड़ी निकले और अध्यक्ष उनके साथ लूडो खेलना चाहते थे। अध्यक्ष से मंत्री सध नहीं पाए। आयोग के अध्यक्ष ने नई तरकीब निकाली। मंत्री से उलझने की बजाए महाशक्ति को चुन लिया। ताकत मिल गई। अध्यक्ष की आंखों में अब आत्मविश्वास है, क्योंकि उसे भरोसा है कि उसकी पीठ ऊंची कुर्सी से सट गई है। अब स्थिति यह है कि एक तरफ आयोग के अध्यक्ष को महाशक्ति की छाया मिल गई है, दूसरी तरफ मंत्री हैं, जो समय का इंतजार करते बैठे हैं। अब अध्यक्ष मंत्री को आंख दिखा रहा है और मंत्री अध्यक्ष की ओर आंख गड़ाकर बैठ गए हैं। एक सरंक्षण से ताकत ले रहा है और दूसरा नियम-कानून से। मंत्री को यह मालूम है कि व्यवस्था में सबसे मजबूत हथियार आवाज नहीं, बल्कि प्रक्रिया है।

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सिर्फ आंकड़ा

कुछ महीनों में राज्य के अलग-अलग कोने से एक शेर, पांच तेंदुए, चार बाइसन, कुछ सांभर और जंगली सुअर मर गए। राज्य में शेड्यूल 1 में आने वाले जानवर मर रहे हैं और वन महकमा जीवित है। यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। जानवरों की मौतें वन महकमे के लिए सिर्फ एक आंकड़ा है। एक सरकारी आंकड़ा। बस। वन महकमे की जिम्मेदारी जानवरों को संरक्षित और सुरक्षित करने की है। मगर सरकारी दस्तावेजों में जानवरों की मौतों को दर्ज करने का बड़ा काम विभाग कर रहा है। शायद जंगल की सिसकियां नया रायपुर के अरण्य भवन के एसी कमरे तक नहीं पहुंच पाती। शायद अफसरों को लगता है कि जानवरों की मौतों पर उनका क्या दोष? दोष, तो जंगल का है। जानवरों का है। परिस्थितियों का है। शिकारी जानवरों को मारकर नाखून-पंजे नोच ले जाएंगे, संवेदना शून्य महकमा इस पर आह तक नहीं भरेगा। सवाल यह है कि जंगल के जानवरों को बचाने सरकार कितनी सजग है? जंगल के जानवर राज्य की धरोहर हैं और धरोहर को संजोया जाता है। शायद सूबे के अफसर जंगल की आड़ में कुछ और ही संजो लेना चाहते हैं।