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दीमक
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एक मंत्री के दिमाग को दीमक कुतर गया है. कुतरा हुआ दिमाग सिकुड़ जाता है और सिकुड़े हुए दिमाग की चेतना कम हो जाती है. ऊटपटांग हरकत कम चेतना का सबूत है. मंत्री पर जिस विभाग की जिम्मेदारी है, उस विभाग की एक योजना, चुनाव पूर्व की बड़ी घोषणा थी. सरकार की साख इस योजना पर टिकी हुई है. योजना पर कोई खोट नहीं, न ही इसके क्रियान्वयन पर. योजना पूरी तरह से जमीन पर है. मगर मंत्री ने जमीन छोड़ने का पूरा मन बना लिया है. मंत्री की टेबल पर आने वाली हर सरकारी फाइलें उनकी उम्मीदों पर पंख लगा जाती है. यही पंख उन्हें उड़ने पर मजबूर कर रहे हैं. खैर, उम्मीदों से भरी इन फाइलों पर धूल की परत जम रही है. मंत्री ने कहीं सुन रखा था कि सरकारी व्यवस्था में अगर कुछ है, तो यही फाइल है, सो मंत्री का भरोसा इन फाइलों पर टिका है. इन फाइलों ने अब तक कुछ दिया नहीं है. जब तक कुछ मिलेगा नहीं, यूं ही इस पर धूल की परत जमती रहेगी. मंत्री के टेबल पर धूल खाती इन फाइलों की वजह से विभाग के रोजमर्रा के काम बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं. आलम यह है कि मंत्री और सचिव के बीच तनातनी बढ़ गई है. सचिव कामकाजी हैं. मेहनती हैं. मगर जब फाइलें ही मुंह फेर लेंगी तब क्या किया जा सकता है.
गुस्सा
एक दबंग विधायक नाराज हैं. गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा था. मगर योग और प्राणायाम के सहारे गुस्सा धीरे-धीरे नीचे उतर आया है. बात मामूली सी थी. विधायक की ख्वाहिश बस इतनी थी कि एक बड़े आयोजन में कनात लगाने और कुर्सी बिछाने का ठेका उनके करीबी को दे दिया जाए. प्रक्रिया चल ही रही थी कि अपनी करतूतों से बदनाम विभाग के एडिशनल डायरेक्टर अपना पर कतरवा बैठे. विधायक का रुतबा बड़ा था. आला अफसरों को मशक्कत करनी पड़ गई. दो अफसरों ने अलग-अलग ठेकेदारों को फोन मिला दिया. अफसरों को आपस में इसकी जानकारी नहीं थी. बस यही थोड़ी गड़बड़ हो गई. ठेका किसी और को मिल गया. विधायक के हिस्से केवल दांत पीसना रह गया. सूबे में जब सरकार नई-नई आई थी, तब शपथ ग्रहण के पहले विधायक ने खुद की ताजपोशी के लिए नए कपड़े सिला रखे थे. समर्थक जोश और उत्साह से लबरेज थे, पर होनी को कुछ और ही मंजूर था. तब कुर्सी नहीं मिली, अब अफसरों की दया भी नहीं मिल रही.
टल गया विस्तार
साय सरकार ने केदार कश्यप को संसदीय कार्य मंत्री की जिम्मेदारी दे दी है. सरकार के इस फैसले के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा फिलहाल टल गई है. यह खबर उन विधायकों को निराश कर गई, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में जमकर पसीना बहाया था. मंत्री पद की रेस में शामिल विधायकों के इलाकों से अच्छी लीड मिली. लग रहा था कि इस जीत के साथ खुशखबरी की मिठाई उनके मुंह में घुल जाएगी, लेकिन भाजपा तो भाजपा है. चर्चा है कि नगरीय निकाय चुनाव के बाद ही अब नए मंत्रियों की ताजपोशी की जाएगी. छह महीने का इंतजार और. ऐसा नहीं है कि भाजपा के लिए यह फार्मूला नया है. 2013 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद रमन सरकार में तीन मंत्रियों के पद खाली रखे गए थे. लोकसभा और नगरीय निकाय चुनाव खत्म हो जाने के बाद मंत्रियों की नियुक्ति की गई थी. महेश गागड़ा, दयालदास बघेल और भैयालाल राजवाड़े मंत्रिमंडल में शामिल किए गए थे. साय सरकार में दो मंत्री पद रिक्त हैं. किसी को हटाया गया तो संख्या बढ़ सकती है. स्थिति जो भी हो, फिलहाल अपनी संभावना टटोल रहे विधायकों को इंतजार करना होगा.
ऑर्गेनाइज्ड करप्शन
कई घोटाले इतनी बारिकी से होते हैं कि किसी को कानोंकान खबर नहीं होती. कोई हल्ला मचाने वाला नहीं होता. इसे ऑर्गेनाइज्ड करप्शन कहा जाता है. कई-कई बार यह सैकड़ों-हजारों करोड़ का होता है. कागजों पर सब कुछ ठीक दिखता है. इसके पीछे की असल कहानी सिर्फ इसके किरदारों को ही मालूम होती है. एक बड़े घोटाले से चर्चा में आए एक विभाग में ऑर्गेनाइज्ड करप्शन की पर्ची कटती रही. मगर शराब, कोयला, सट्टा जैसे घोटालों की गूंज में यह कहीं खो कर रह गई. पूर्ववर्ती सरकारों में एक धाकड़ नेता थे, जो कहते थे कि सरकार को चिंदी चोरी से बचना चाहिए. ऑर्गेनाइज्ड करप्शन से बदनामी नहीं होती. सब काम स्मूथली हो जाता है. सरकार की इमेज बनी रहती है. चिंदी चोरी करना, बदनामी मोल लेने जैसा है. नेताजी कहते थे कि समुद्र में चलने वाली नांव में मछली खुद कूदकर आती है. मछली पकड़ने के लिए जाल बिछाने की जरूरत नही होती. बहरहाल करप्शन के समुद्र में इस ऑर्गेनाइज्ड करप्शन की कोई चर्चा नहीं. ये ऑर्गेनाइज्ड करप्शन राहत इंदौरी के उस शेर की तरह हैं, जिसमें वह कहते हैं, ‘ ये बूढ़ी कब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएंगी, मुझे तलाश करो दोस्तों यहीं हूं मैं..’
शौक ए दीदार
नगरीय निकाय चुनाव सिर पर हैं. निकायों से पैसे की मांग की जा रही है, जिससे विकास के काम तेज किए जा सके. मगर सरकार की वित्तीय हालत इजाजत नहीं देती. कहते हैं कि नगरीय प्रशासन विभाग को निकायों से करीब 2700 करोड़ रुपए के प्रपोजल भेजे गए हैं. विभाग के पास महज 300 करोड़ रुपए है. जरूरत के अनुपात में यह राई दाने बराबर भी नहीं. निकायों में पैसा जाएगा तो सड़क, पानी, बिजली के काम होंगे. यही काम रुलिंग पार्टी को मजबूती दिलाते हैं. अब चुनौती है कि 300 करोड़ में कौन-कौन से विकास के काम पूरे कर लिए जाए. भाजपा कार्यसमिति की बैठक में प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन ने कहा था कि राज्य के 1100 वार्ड ऐसे हैं, जिस पर कांग्रेस लगातार जीत रही है. इन वार्डों पर नजर डालने की जरूरत है. इन वार्डों के लिए एक शायरी है, ”शौक ए दीदार अगर है, तो नजर पैदा कर” यहां नजर पैदा करने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल है नहीं.
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