Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

बंद मुठ्ठी की सत्ता

पिछले हफ्ते ‘पावर सेंटर’ में आईएएस और आईपीएस अफसरों के बीच वर्चस्व की जो लड़ाई चर्चा में आई थी, वह केवल हवा में उठी बात नहीं थी। कुछ अफसरों ने फोन कर इस स्तंभ में उठाए गए मुद्दों पर और रोशनी डाली, जिससे स्पष्ट हुआ कि मामला सोचने से कहीं अधिक गंभीर है। इस बातचीत का लब्बोलुआब यह रहा कि अपनी भूमिका को लेकर आईपीएस बिरादरी की शिकायत सीधी और पुरानी है। उनके अधिकार क्षेत्र में आईएएस का दखल स्वाभाविक मान लिया गया है, लेकिन आईएएस की टेरिटरी में आईपीएस की मौजूदगी अब भी सिर्फ एक प्रयोग मानी जाती है। जैसे कोई अस्थायी व्यवस्था। जब तक जरूरत हो, तब तक ठीक। चर्चा यहीं नहीं रुकती। आईपीएस बिरादरी यह सवाल उठाती है कि जिन पदों को विभागीय अधिकारियों के प्रमोशन से भरा जाना चाहिए था, उन पर भी आईएएस अफसरों ने धीरे-धीरे अंगद के पैर सरीखे अपना कब्जा जमा लिया। आईएएस के कैडर पोस्ट बढ़ते चले गए और दूसरी सर्विसेज के लिए स्पेस सिमटता चला गया। आईपीएस बिरादरी की तकलीफ तब और बढ़ती दिखती है जब मंत्रालय में सेक्रेटरी रैंक पर आईएफएस, आईआरएस या दूसरे सेंट्रल सर्विसेज के अफसरों की पोस्टिंग आसानी से हो जाती है, मगर आईपीएस व्यवहारिक कठिनाइयों का शिकार हो जाते हैं। आईपीएस बिरादरी कहती है कि इसी राज्य में रिटायर्ड डीजी श्रीप्रकाश शुक्ला और अशोक दरबारी पीएससी के चेयरमैन रहे हैं। डीजी रैंक के अफसर हिमांशु गुप्ता जिला पंचायत सीईओ से लेकर तकनीकी शिक्षा विभाग में डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वरिष्ठ आईपीएस जी.पी. सिंह को खेल विभाग में डायरेक्टर की हैसियत से तैनाती मिल चुकी है। पूर्ववर्ती सरकार में एडीजी स्तर के अफसर दीपांशु काबरा जनसंपर्क आयुक्त रहे हैं और आईपीएस श्वेता श्रीवास्तव सिन्हा खेल विभाग का जिम्मा संभालती रहीं हैं। मौजूदा सरकार में भी जनसंपर्क की कमान आईपीएस मयंक श्रीवास्तव को दी जा चुकी है और फिलवक्त आईपीएस राहुल भगत मुख्यमंत्री सचिवालय में ताकतवर ओहदे पर हैं। मगर इन तमाम उदाहरणों के बावजूद एक असहज सच्चाई सामने खड़ी रहती है कि ये सब अपवाद है। स्थायी व्यवस्था नहीं। रायपुर कमिश्नरेट के दायरे को लेकर उठे विवाद ने इस लकीर को और गहरा कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि किसका दायरा कितना हो, सवाल यह है कि दायरा तय करने की कलम किसके हाथ में है। आईएएस अपने तर्कों के साथ खड़े हैं। आईपीएस अपने तर्क रख रहे हैं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि एक के तर्क फैसलों में ढल जाते हैं और दूसरे के तर्क बहस बनकर रह जाते हैं। बस यहीं आकर राज्य के ब्यूरोक्रेटिक अरेंजमेंट का असली चेहरा दिखता है। असल बात यह है कि इस व्यवस्था में आईएएस अफसरों का कोई तोड़ नहीं है। वजह बेहद साफ है, आईएएस अफसरों की मुठ्ठी बंद है और आईपीएस अफसरों की खुली हुई। पुरानी कहावत यूं ही नहीं बनी, बंद मुठ्ठी लाख की और खुली मुट्ठी खाक की। बंद मुट्ठी एकता, शक्ति, संकल्प और प्रतिरोध का एक शक्तिशाली प्रतीक है और खुली मुट्ठी बिखराव और कमजोरी का। 

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जूतमपैजार

आईएएस अफसरों की बंद मुठ्ठी की ताकत इतिहास में दर्ज है। एक दशक पहले की बात है। एक आईएएस अफसर एसीबी के हत्थे रिश्वत लेते रंगे हाथों चढ़ गए थे। उस वक्त एसीबी की कमान एक तेज तर्रार आईपीएस के हाथों थी। मामला बिल्कुल साफ था। आईएएस के खिलाफ सबूत ठोस थे और कार्रवाई तय मानी जा रही थी। मगर आईएएस बिरादरी हरकत में आ गई। बंद मुठ्ठियां खुली नहीं बल्कि मजबूती से और कस ली गईं। आईएएस एसोसिएशन ने सत्ता के केंद्र तक की घेराबंदी कर दी। अचानक एसीबी के हाथ बंध गए। अफसर बच निकले। एकजुटता जीत गई। अब जरा आईपीएस अफसरों की ओर नजर घुमा आइए। यहां भी अफसर हैं। वर्दी है। ताकत है। मगर मुट्ठी खुली हुई है। आईपीएस बिरादरी आज एक-दूसरे को निपटाने में ही उलझी हुई है। यहां घेराबंदी अपने ही कैडर के खिलाफ है। जूतमपैजार चल रहा है। आईपीएस कई खेमे बंट गए हैं। हर खेमा, दूसरे खेमे के सामने हथियारबंद होकर मोर्चा लिए हुए खड़ा है। ऐसे में सूबे के आईपीएस क्या ख़ाक कभी आईएएस की जगह ले पाएंगे। पहले ये खुद से तो निपट लें। 

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विकेट गिरना तय

एक विभाग में एक टेंडर ने विवाद खड़ा कर दिया है। सेक्रेटरी और डायरेक्टर आमने-सामने हैं। चर्चा है कि सेक्रेटरी अपने किसी चहेते को काम दिलाने के लिए खासे बेचैन हैं। चहेते ने भी पहले ही यह समझ लिया था कि सरकारी काम में पहले आवभगत चलती है। सो उसने अपनी हिस्से की जिम्मेदारी निभा ली है। सेक्रेटरी की खूब आवभगत की है। अब बारी सेक्रेटरी की है। सेक्रेटरी पर अपने चहेते को काम दिलाने की नैतिकता का दबाव है। यह दबाव उन्होंने डायरेक्टर के कंधे पर टिका दिया। दो टूक हिदायत दे दी और कहा- टेंडर निकालो और ऐसा गणित बिठाओ कि उनके चहेते को ही काम मिल जाए। बात यहीं खत्म नहीं हुई। चर्चा है कि इस हिदायत के साथ दस प्रतिशत कमीशन की स्पष्ट व्याख्या भी कर दी गई, ताकि कहीं भ्रम न रहे। डायरेक्टर भी तेजतर्रार निकलीं। दो टूक जवाब दे दिया और कहा कि टेंडर जो क्वालिफ़ाई करेगा, वही काम पाएगा। न शर्तों में ढिलाई होगी और न ही किसी चहेते के लिए नियम बदले जाएंगे। बस, इतना सुनते ही सेक्रेटरी की भौंह तन गई। सरकारी तंत्र में ऊपर बैठे अफसर के सुनाए गए फरमान को नकार देना साहस का काम है। तंत्र का जिम्मा उठाने वाले लोग अपनी खुली आंखों से सेक्रेटरी-डायरेक्टर का यह खेल देख रहे हैं। अब सुना जा रहा है कि प्रस्तावित फेरबदल में दोनों में से किसी एक का विकेट गिरना तय है। 

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एसपी की पीड़ा

प्रमोशन नहीं मिलने से नाराज कवर्धा एसपी धमेंद्र छवई ने अपनी पीड़ा को पहले कागज पर शब्दों में उतारा और उसे सत्ता के दरवाजे पर छोड़ आए। चुपचाप ऐसा करते तो इस पर चर्चा भी न होती, लेकिन उन्होंने खुद ही इसकी मुनादी कर दी। एसपी ने कई अफसरों के नामों का जिक्र करते हुए पूछा कि जब उन सबको प्रमोशन मिल सकता है तो मुझे क्यों नहीं? एसपी बस यह भूल गए कि सरकारी तंत्र के भीतर लोकतंत्र नहीं चलता। यहां नियमों की अपनी व्यवस्था है। अपनी बात एक चैनल में ही रखी जा सकती है। मगर एसपी ने खुद ही एक नया पुल बना लिया। आला अफसर हैरत में हैं कि एसपी की पीड़ा ज़ाहिर करने की इस शैली को क्या कहा जाए? साहस या दुस्साहस। हैरानी यह भी है सिस्टम ने अब तक यह तय नहीं किया है कि इस पर नाराज होना है या इसे भूल मानकर नजरअंदाज कर देना है। सिस्टम को डर यह भी है कि अगर नजरअंदाज किया तो आने वाले समय में अफसरों की हर पीड़ा पत्र बन जाएगी और हर पत्र मिसाल। अब देखते हैं कि अनुशासन की घुट्टी पिलाने वाला विभाग इस पत्र को नई परंपरा का पहला दस्तावेज मानता है या फिर कुछ और करता है। 

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इलेक्शन कैडर

पांच राज्यों के चुनाव हैं। छत्तीसगढ़ से 25 आईएएस और 5 आईपीएस अफसरों की ड्यूटी लगाई गई है। आईपीएस अफसरों में इस बार एक एडीजी और चार आईजी रैंक के अफसर शामिल हैं। आमतौर पर अब तक डीआईजी और एसपी स्तर के अधिकारी चुनावी ड्यूटी पर भेजे जाते रहे हैं। आईएएस अफसरों की सूची और भी ज्यादा दिलचस्प है। सूची देखते ही यह समझ आ जाता है कि अफसरों का चयन तात्कालिक तौर पर नहीं लिया गया है। यह लगभग हर चुनाव में आजमाए हुए चेहरे हैं। अब्दुल केसर हक़, शम्मी आबिदी, शिखा राजपूत तिवारी, धर्मेश साहू, संजीव झा, पीएस एल्मा, सारांश मित्तर, पुष्पेंद्र मीणा, तारण प्रकाश सिन्हा, विनीत नंदनवार, जगदीश सोनकर, रितुराज रघुवंशी जैसे नाम लगभग हर चुनाव की सूची में दिख जाते हैं। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार दोनों यह मानकर चलते हैं कि इन अफसरों के बिना किसी भी राज्य में चुनाव कराना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। बार-बार चुनावी ड्यूटी पर भेजे जाने वाले अफसर भी अब यह महसूस करने लगे हैं कि मानो वह चुनाव आयोग की स्थायी सूची का हिस्सा हैं। इन अफसरों की पहचान भी शायद अब उनके विभागीय काम से ज़्यादा, चुनावी ड्यूटी से बनने लगी है। चुनावी ड्यूटी के लिए इस बार भी चुने गए एक आईएएस कहते हैं कि लगता है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के भीतर एक अलग ही उप सेवा बन गई है। इस सेवा का नाम है, इलेक्शन कैडर। बार-बार उन्हीं अफसरों की चुनावी तैनाती को लेकर औपचारिक बहस में उंगली जरूर चुनाव आयोग पर उठती है। यह कहा जाता है कि आयोग बार-बार उन्हीं अफसरों को चुनता है, लेकिन व्यावहारिक सच्चाई यह है कि अफसरों का नाम राज्य सरकार भेजती है। आयोग की भूमिका उस सूची पर मुहर लगाने तक सीमित रहती है। अब अफसर भी बेमन से चुनावी ड्यूटी पर जा रहे हैं। उनके मन में यह बात घर कर गई है कि लोकतंत्र जनता से चलता है और चुनाव तंत्र उनकी ड्यूटी से। 

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बुरा मान गए नेताजी 

गणतंत्र दिवस के मौके पर सत्ताधारी दल के एक नेता को उनके ही जिले में मुख्य समारोह का मुख्य अतिथि बनाया गया। लोकतंत्र का उत्सव था, लेकिन नेता जी की नज़र पहले ही उस हिस्से पर टिक गई थी, जहां उनका निजी हित था। उन्होंने जिला प्रशासन से साफ-साफ कह दिया कि पूरे आयोजन की तैयारी का जिम्मा उनके करीबी आदमी को दिया जाए। मांग बहुत बड़ी नहीं थी। बस इतनी भर थी कि गणतंत्र दिवस का मंच, टेंट और दूसरे इंतजाम उन कंधों पर सौंप दिया जाए, जिस पर नेताजी ने हाथ रखा है। मगर दिक्कत यह थी कि जिला प्रशासन ने नियमों के मुताबिक यह काम पहले ही किसी और के कंधों पर सौंप रखा था। मुख्य समारोह के लिए टेंट तनने शुरू हो गए थे। इस पर नेता जी बुरा मान गए। उन्होंने बिना किसी भूमिका के दो टूक कह दिया, अगर काम हमारे आदमी को नहीं मिला, तो हम झंडा फहराने नहीं आएंगे। जिला प्रशासन समझ गया। इसके बाद सारे नियम पीछे हट गए। प्रक्रिया निरस्त हो गई। नेता जी के आदमी को आयोजन की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई। जो टेंट पहले से लग चुके थे, वे उखाड़ दिए गए। नए टेंट तने। इस बार नेताजी के पसंद के थे। उसी टेंट के नीचे खड़े होकर उन्होंने झंडा फहराया। संविधान की प्रस्तावना पढ़ी। लोकतंत्र की मजबूती पर प्रेरक भाषण दिया। देश के लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती का दिन पूरे सम्मान के साथ मनाया गया। बस एक बात बहुत साफ हो गई। जिस तंत्र में गणतंत्र दिवस का मंच भी शर्तों पर टिका हो, वहां लोकतंत्र का उत्सव एक औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं रह जाता है।