Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

टूटती गरिमा

सूबे की राज्य प्रशासनिक सेवा से जुड़े अफसर चर्चा के केंद्र में हैं। चर्चा उनके कारनामों को लेकर है। मामला यह नहीं है कि राज्य प्रशासनिक सेवा का पूरा कुनबा बिगड़ गया है, मगर साढ़े चार सौ से ज्यादा अफसरों के इस कैडर में करीब आधा दर्जन नाम ऐसे हैं, जिनकी हरकतों ने पूरी बिरादरी की गर्दन झुका दी है। भ्रष्टाचार, हत्या से लेकर दुष्कर्म जैसे संगीन आरोप लगे हैं। भारतमाला घोटाले में निर्भय साहू और शशिकांत कुर्रे, बजरमुड़ा मुआवजा घोटाले में अशोक मार्बल के किए धरे की चर्चा थमी भी नहीं थी कि हाल ही में बेमेतरा एसडीएम टी आर माहेश्वरी को रिश्वत लेते एसीबी ने दबोच लिया था और अब बीते हफ्ते बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में एसडीएम करुण डहरिया पर हत्या का मामला दर्ज हुआ है। इस बीच ही खबर आई कि गर्लफ्रैंड से रेप के मामले में डिप्टी कलेक्टर दिलीप उइके को निलंबित कर दिया गया है। इन अफसरों ने नौकरी खैरात में नहीं पाई थी। सालों की तैयारी, कठिन परिक्षाएं और परिवार की उम्मीदों का बोझ सिर पर ढोकर ही अपना मुकाम हासिल किया था। मगर नतीजा क्या हुआ? सालों की मेहनत का निचोड़ एक एफआईआर की स्याही में खर्च हो गया। असल संकट यह नहीं है कि राज्य प्रशासनिक सेवा के कुछ अफसर फिसल गए हैं। संकट यह है कि फिसलन लगातार बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। कुछ अफसरों की चूक पूरी बिरादरी का परिचय नहीं हो सकती है, लेकिन यदि यह फिसलन बढ़ती दिखने लगे, तो उसे केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं माना जा सकता। यह राज्य प्रशासनिक सेवा के लिए संस्थागत चिंता का मुद्दा बन गया है। राज्य प्रशासनिक सेवा सरकारी व्यवस्था की रीढ़ है। शासन का ढांचा कितना भी मजबूत क्यों न हो, यदि रीढ़ ही झुकती दिखे, तो वह डगमगाने लग जाएगा। अफसरों को भी यह समझना होगा कि उनके पद की ऊंचाई चरित्र की गारंटी नहीं देती है। चरित्र जब गिरता है, तो सबसे पहले उस कुर्सी की गरिमा टूटती है, जिस पर वह बैठा हुआ है। 

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कलेक्टरों की भूमिका

राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की नैतिक गिरावट के बीच एक मौजूं सवाल यह भी है कि जब किसी जिले में डीएसपी, एसडीओ फारेस्ट या किसी वर्क्स डिपार्टमेंट के इंजीनियर की पोस्टिंग सरकार करती है, तो एसडीएम की तैनाती का अधिकार कलेक्टरों के हिस्से क्यों है? अफसरों का व्यक्तिगत पतन अलग बात है, लेकिन अगर संस्थागत पतन हो रहा है तो कलेक्टरों की भूमिका का जिक्र क्यों नहीं होना चाहिए? सरकारी व्यवस्था का यह गणित बड़ा रोचक है। किसी जिले में एसपी चाहकर भी डीएसपी पर सीधी कार्रवाई नहीं कर सकता। मगर एसडीएम को यह मालूम है उसकी कुर्सी में लगे स्क्रू को ढीला या टाइट करने के लिए जिस पेचकश की जरूरत है, वह कलेक्टर के हाथ में है। एसडीएम अगर कलेक्टर से थोड़ा भी दाएं-बाएं चला तो उसका स्क्रू ढीला पड़ना तय है। शायद यही वजह है कि कुर्सी की अनिश्चितता उनके निर्णय की निष्पक्षता को धीरे-धीरे खा जाती है। एसडीएम के हिस्से एक बड़ा बोझ बेगारी का भी है। नेता, मंत्री, अफसरों के कई किस्म के निजी हित साधने का जिम्मा एसडीएम के सिर पर है। दूसरों के निजी हित साधते-साधते मन यह तो पूछेगा ही कि स्वहित की परिभाषा फिर गलत क्यों मानी जाए? बस यही से चूक की पहली रेखा भी खिंचती है। दरअसल संस्थागत व्यवस्था को मजबूत किए बिना किसी अफसर से आदर्श आचरण की अपेक्षा करना अंततः एक अधूरी कोशिश ही होगी। यदि प्रशासनिक सुधार का इरादा सचमुच है, तो समाधान जटिल नहीं है। एक साधारण मगर निर्णायक कदम यह हो सकता है कि एसडीएम की तैनाती का नियंत्रण सीधे सरकार के हाथ में लिया जाए। इससे अधिकार और जवाबदेही का संतुलन बेहतर होगा। नैतिकता के मानक स्पष्ट रहेंगे। हां, यह जरूर है कि कलेक्टर अपने अधिकार में ऐसी कटौती नहीं चाहेंगे!

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मेंटरशिप

एक दौर था। जब आला अफसर खुद मेंटरशिप पर जोर देते थे। नए अफसरों की फील्ड पोस्टिंग में इस बात का ख्याल रखा जाता था कि आला अफसरों की देखरेख में उन्हें जमीनी प्रशिक्षण दिया जा सके। हर नए अफसर की फील्ड पोस्टिंग सुनिश्चित होती थी। नियम-कानून की बारीकियों के साथ-साथ जिम्मेदारी सिखाई जाती थी। यह व्यवस्था आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, राज्य प्रशासनिक सेवा, राज्य पुलिस सेवा जैसी सभी सर्विसेज में लागू थी। अब यह बीते जमाने की बात हो गई है। मेंटरशिप पर किसी का कोई जोर नहीं दिखता। एक दशक में तो कम से कम ऐसी प्रैक्टिस देखने को नहीं मिली। न तो चीफ सेक्रेटरियों की इसमें रूचि रही और न ही इस दौर में आए डीजीपी की। अफसरों की बेतरतीबी बढ़ती गई और रोक लगाने का कोई मैकेनिज्म डेवलप नहीं किया जा सका। मेंटरशिप कोई कागजी नियम नहीं था। यह एक छोटी सी सामान्य प्रैक्टिस थी। अब लगता है कि सभी नए रंगरूट अभिमन्यू की तरह मां के पेट से ही सब कुछ सीखकर पैदा हो रहे हैं। सरकारी व्यवस्था के पूर्व प्रचलित नियम कायदे और तौर तरीके बासी खाने की तरह हो गए हैं, जिसे नए अफसर चखना भी नहीं चाहते। मगर अफसर यह भूल गए हैं कि अभिमन्यू भी चक्रव्यूह के भीतर जाना जानता था, निकलता नहीं। मेंटरशिप यही हुनर सिखाती थी कि चुनौतीपूर्ण हालात में रास्ता कैसे ढूंढना है। अब के अफसरों का विजन क्लियर है। कुर्सी मिली है, रुतबे के लिए। पैसे के लिए। पावर के लिए। दूसरी सभी बुनियादी चीजें गैर जरूरी हैं। एक दफे एक सुलझे हुए वरिष्ठ अधिकारी ने भारी मन से कहा था कि इस राज्य में अफसरों की एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो चुकी है और इस बर्बादी को रोकने वाला फिलहाल कोई नहीं और न ही इसे ठीक करने की कोई उम्मीद बची रह गई है। 

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दृष्टांत

स्टेट सर्विसेज से आईएएस प्रमोशन की जारी हुई सूची एक दृष्टांत के तौर पर याद रखी जाएगी। बीरेंद्र पंचभाई की नौकरी की शुरुआत नायब तहसीलदार से हुई थी। आज वह आईएएस बन गए हैं। सुमीत अग्रवाल और संदीप अग्रवाल दो सगे भाई एक साथ आईएएस प्रमोट हुए। ये भी इत्तेफाक है। यह इत्तेफाक तब भी था जब स्टेट पीएससी में दोनों एक साथ सलेक्ट हुए थे। सबसे ज्यादा दिलचस्प नाम सौमिल रंजन चौबे का रहा। संभवतः यह देश के इतिहास की पहली घटना होगी जब यूपीएससी या पीएससी की परीक्षा दिए बगैर वह आईएएस बन गए। इसी तरह तीर्थराज अग्रवाल के रास्ते कम रोड़े नहीं थे। कानूनी अड़चने थी, लेकिन उससे पार पाते हुए उन्हें भी आईएएस अवार्ड हो ही गया। अलाइड सर्विस से आईएएस बने तरुण किरण साल 2014 बैच के जीएसटी अफसर हैं। इस बैच के राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों का नंबर 2030 तक भी मुश्किल दिख रहा है, मगर तरुण का नंबर पहले लग गया। 

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हल्ला 

भीतरखाने से खबर आई है। एक सज्जन के पास सरकार के इर्द-गिर्द घूमने का पास था। थोड़ा रसूख भी था। इस रसूख के बूते ही उन्होंने दो अलग-अलग विभागों में काम करने वाले दो अफसरों से मोटी रकम यह कहते हुए वसूल ली कि वह उन्हें अलाइड सर्विस के कोटे से आईएएस बनाने की गारंटीड टिकट दिला देंगे। सुना है कि सज्जन ने यह भरोसा दिलाया था कि सरकार जो नाम भेजेगी, मुहर उस पर ही लगेगी। हुआ भी यही। उन नामों पर ही मुहर लगी, जिसकी पैरवी सरकार ने की थी। मगर यह वो नाम नहीं थे, जिनसे सज्जन ने मोटी रकम वसूल रखी थी। अब हल्ला मच गया है। न जाने इस पर सरकार का क्या रूख होगा। 

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शैडो

कौन जानता था कि छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाएंगे। सूबे में कई बल्लमखां नेता भी उनके वजूद को भाव नहीं देते थे। अब है तो राष्ट्रीय अध्यक्ष। मन मसोसकर ही सही दंडवत तो होना ही होगा। खैर, मुद्दे की बात यह है कि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ के नेता-मंत्री-अफसर की शिकायत सुन-सुन कर थक गए हैं। उनका पर्सनल मोबाइल नंबर हर किसी के पास है, सो जिसे जब कुछ शिकायत करनी होती है, वह सीधे एक मैसेज घनघना देता है। सुना है कुछ लोगों के खिलाफ उन्हें कुछ सबूत भी भेजे गए हैं। देश के कई राज्यों में चुनाव हैं। फिलहाल नितिन नबीन की व्यस्तता उन राज्यों में है। जाहिर है इस किस्म के मैसेज पर फौरी तौर पर कुछ होगा भी नहीं, लेकिन आने वाले दिनों में राष्ट्रीय अध्यक्ष छत्तीसगढ़ की सत्ता और संगठन में कोई बड़ा आमूलचूल परिवर्तन किए जाने के मसौदे पर मुहर लगा दें, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। राज्य संगठन को नया प्रदेश प्रभारी भी जल्द मिलने वाला है। प्रभारी जो कोई भी होगा, यह तय है कि वह नितिन नबीन का शैडो ही होगा।