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रायपुर. बाजार में असली और नकली के बीच फर्क करना बहुत मुश्किल है. गाइडलाइन के अनुसार ग्रीन पटाखों पर क्यूआर कोड जरूरी है, लेकिन नकलचियों ने उसका भी तोड़ निकाल लिया है. क्यूआर कोड तो है पर स्कैन नहीं होता.
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दीवाली पर्व पर पटाखों का अपना क्रेज होता है. लोगों की सबसे बड़ी समस्या फूस्सी बम-पटाखे निकल जाना या बीच में चलते-चलते बंद हो जाना होती है. यही शिकायत रहती है, नकली पटाखे दे दिए. ग्रीन पटाखों को सीएसआईआर की नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा सर्टिफाइड किया जाता है. अगर आप ग्रीन पटाखे खरीदने जाएं और असली-नकली की आपको पहचान करनी हो तो सबसे पहले पटाखे के ऊपरी डिब्बे पर बने क्यूआर कोड स्कैन करें.
कैसे होगा स्कैन
गूगल प्ले स्टोर से सीएसआईआर-नीरी के मोबाइल ऐप को डाउनलोड करना होगा. इसके बाद उस क्यूआर कोड को स्कैन करने पर सारी हकीकत आपके सामने आ जाएगी.
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भले क्यूआर कोड नहीं, पर पटाखे असली है!
पटाखा व्यापारियों का दावा किया है कि भले ही पटाखों पर क्यूआर कोड नहीं है, लेकिन शहर में बेचे जा रहे पटाखे ग्रीन ही हैं. पटाखों पर क्यूआर कोड होना चाहिए, यह फैसला पिछले साल हुआ, लेकिन पटाखा निर्माता बल्क में पैकिंग मटेरियल प्रिंट कराते हैं. ऐसे में बिना क्यूआर कोड प्रिंटिंग वाले पैकिंग मटेरियल का उपयोग किया गया है.
विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण
पैकेज पर क्यूआर कोड विश्वसनीयता का प्रमाण भी होता है. अब साबुन, चिप्स, घी तक की कंपनी क्यूआर कोड के माध्यम से अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी), फोन नंबर और ई-मेल आईडी जैसी जरूरी जानकारी पैकेज में दे रहे हैं. अधिकारी ने आगे बताया कि अगर कोई निर्माता कंपनी पैकेज पर क्यूआर कोड के माध्यम से डिटेल देगी तो उसे पैकेज पर ये लिखना होगा कि उपभोक्ता अन्य संबंधित विवरणों के लिए क्यूआर कोड को स्कैन करें.
1 जनवरी 2023 से दवा कंपनियों पर होगा लागू
नकली दवाइयों के कारोबारियों पर नकेल कसने के लिए सरकार ने ये अहम फैसला लिया है, जिसे 1 जनवरी 2023 से लागू किया जाएगा. इस नियम के अनुसार दवा कंपनियां दवाइयों पर क्यूआर कोड लगा देंगी, जिसे स्कैन करते ही आपको उस दवा के दाम के साथ कॉम्बिनेशन आदि के बारे में पता चल जाएगा. क्यूआर कोड स्कैन करने के बाद आपको ‘एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स का पता चलेगा. वहीं, इससे आपको पता चल जाएगा इस दवा को कैसे और किस प्रकार के कच्चे माल से बनाया गया है.
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