Rajasthan News: जालोर: भांडवपुर जैन तीर्थ में गुरुवार को पंचान्हिका महोत्सव के पांचवें दिन दीक्षा समारोह का आयोजन हुआ। इस दौरान मात्र 12 वर्षीय मुमुक्षु आदित्य कुमार ने सांसारिक सुखों का त्याग कर संयम का मार्ग चुना। जैनाचार्य जयरत्नसूरीश्वर, साध्वी अरुणाप्रभा, साध्वी अध्यात्मकला और अन्य साधु-साध्वियों की उपस्थिति में दीक्षा की प्रक्रिया संपन्न हुई।

सुबह शुभ मुहूर्त में दीक्षार्थी आदित्य राज चंदन मंजू वाटिका से गाजे-बाजे के साथ पांडाल में पहुंचे, जहां श्रद्धालुओं ने उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। इसके बाद दीक्षा की विधि शुरू हुई। जैनाचार्य ने आदित्य को पवित्र ओघा प्रदान किया, जिसे पाकर वे आनंद से अभिभूत हो गए। केशलोचन की प्रक्रिया के बाद उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किए। जब वे मुनि वेश में पांडाल में लौटे, तो पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठा।
आदित्य कुमार बने मुनि पूर्णानंद विजय
जैनाचार्य जयरत्नसूरीश्वर ने दीक्षार्थी आदित्य कुमार का नया नामकरण किया और अब वे मुनि पूर्णानंद विजय महाराज के नाम से जाने जाएंगे। दीक्षा के दौरान जब उन्होंने अपने वस्त्र परिजनों को सौंपे और केशलोचन करवाया, तो उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं की आंखें भावुकता से नम हो गईं।
तप से आत्मा की शुद्धि और कर्मों का नाश: जैनाचार्य
महोत्सव के अंतिम दिन तप मंदिर का शिलान्यास भी हुआ। जैनाचार्य और साधु-साध्वियों की मौजूदगी में विधिकारक ने पूजन के साथ शिलान्यास संपन्न कराया। इस अवसर पर योगिराज शांतिविजय का 29वां पुण्योत्सव भी मनाया गया। अपने व्याख्यान में जैनाचार्य जयरत्नसूरीश्वर ने कहा, “जैन धर्म में तप का विशेष स्थान है। तप से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित होता है। तप के अभाव में मन इंद्रियों को भटकाता है, जिससे आत्मा पाप कर्मों में उलझकर 84 लाख योनियों में भटकती है। तप के माध्यम से आत्मा शुद्ध होती है और कर्मों का नाश होता है।”
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