Rajasthan News: जयपुर की हवामहल सीट से भाजपा विधायक बालमुकुंद आचार्य अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। गुरुवार को अजमेर के दक्षिणमुखी बालाजी हनुमान धाम में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने जनसंख्या असंतुलन को लेकर ऐसी बात कह दी, जिससे सियासी गलियारों में बहस छिड़ गई है। उन्होंने सीधे तौर पर समाज को चेतावनी देते हुए कहा कि हम दो हमारा एक वाली सोच देश की संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है।

चच्चा बहुसंख्यक हो जाएंगे और हम अल्पसंख्यक: बालमुकुंद

विधायक ने अपने संबोधन में जनसंख्या के बढ़ते ग्राफ और असंतुलन पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि अगर हिंदू समाज इसी तरह सीमित रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपने ही देश में अल्पसंख्यक कहलाएंगे। उन्होंने विवादित लहजे में कहा कि हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे और ‘चच्चा’ बहुसंख्यक हो जाएंगे। इस दौरान उन्होंने नया नारा उछालते हुए कहा- हम दो हमारे दो-चार होने दो।

चीन का दिया उदाहरण, बोले- बच्चे बढ़ेंगे तो बढ़ेगा व्यापार

आमतौर पर बढ़ती जनसंख्या को बेरोजगारी और गरीबी का कारण माना जाता है, लेकिन बालमुकुंद आचार्य ने इस तर्क को पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए बताया कि चीन की आबादी ज्यादा है, फिर भी वहां का व्यापार और आत्मनिर्भरता दुनिया में नंबर-1 है। पीएम मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को पूरा करने के लिए परिवारों का बड़ा होना जरूरी है। पुराने समय में 10-12 बच्चों के परिवार होते थे, जिससे रिश्तों में मजबूती रहती थी।

रिश्तों के टूटने का सताया डर

विधायक ने भावुक अपील करते हुए कहा कि एक बच्चे की सोच से रिश्ते खत्म हो रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर एक ही बच्चा होगा और वह नौकरी के लिए विदेश चला गया, तो पीछे बूढ़े माता-पिता का सहारा कौन बनेगा? उन्होंने तर्क दिया कि परिवार बड़ा होगा तभी कोई फौज में जाएगा, कोई पुलिस बनेगा और कोई खेती-किसानी कर देश की सेवा करेगा।

नौकरी छोड़ो, मालिक बनो युवाओं को सलाह

कार्यक्रम के दौरान विधायक ने युवाओं को सरकारी नौकरी की मानसिकता से बाहर निकलने को कहा। उन्होंने कहा कि युवाओं को जॉब सीकर की जगह जॉब प्रोवाइडर बनना चाहिए। गौरतलब है कि कार्यक्रम के अंत में भव्य महाआरती हुई, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

बालमुकुंद आचार्य का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। रायपुर के राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसे बयान ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देते हैं। जहां एक वर्ग इसे सांस्कृतिक रक्षा के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे बढ़ती महंगाई और संसाधनों की कमी के दौर में अव्यवहारिक मान रहा है। प्रशासन भी इस तरह के भाषणों के बाद क्षेत्र में सांप्रदायिक सौहार्द पर नजर बनाए हुए है।

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