Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि अभियुक्त को जेल से रिहा किया गया है तो फिर गरीबी उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को बाधित नहीं कर सकती। यदि अभियुक्त जुर्माना राशि की व्यवस्था करने की स्थिति में नहीं है और वह इस कारण रिहाई के आदेश के तीन माह बाद भी जेल में है तो यह उसके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की अवहेलना है।

इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता अभियुक्त को राहत देते हुए जुर्माना राशि जमा कराने की शर्त को वापस लेते हुए उसे तत्काल रिहा करने के आदेश दिए हैं। जस्टिस अनूप कुमार ने यह आदेश राजेश कुशवाह की सजा स्थगन याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि केस के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह आदेश दिया जा रहा है। ऐसे में इस आदेश को अन्य मामलों में मिसाल के तौर पर नहीं माना जाए। याचिका में कहा गया था कि एनडीपीएस मामले में उसे दोषी मानते हुए अजमेर की नसीराबाद एडीजे कोर्ट ने 10 अक्टूबर, 2024 को उसे दस साल की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही उस पर एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया था। वह करीब आठ साल से जेल में बंद हैं। ऐसे में उसकी सजा को स्थगित किया जाए।

हाईकोर्ट ने मामले में गत 7 अक्टूबर को याचिकाकर्ता के सजा स्थगन प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए अपील के निस्तारण तक उसे जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए थे। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि अभियुक्त की ओर से निचली अदालत की ओर से लगाए जुर्माने की राशि जमा कराने पर उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाए। अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत की जानकारी में आया की गरीबी के कारण याचिकाकर्ता जुर्माना राशि एक लाख रुपए जमा नहीं करा पाया है। ऐसे में तीन माह पहले रिहाई का आदेश होने के बावजूद वह अभी तक जेल में ही बंद है। इस पर अदालत ने जुर्माना जमा कराने की शर्त को हटाते हुए अभियुक्त को रिहा करने के आदेश दिए हैं।

वकीलों के बहिष्कार पर की टिप्पणी

शनिवार को हाईकोर्ट में कार्यदिवस घोषित करने के विरोध में वकीलों के स्वेच्छा से कार्य बहिष्कार के चलते याचिका पर के सुनवाई के दौरान कोई वकील पेश नहीं हुआ। इस पर अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी वकीलों बहिष्कार को गलत बता चुका है। इसके अलावा हाईकोर्ट वे भी इस संबंध में एक विशेष नोट जारी कर शनिवार को केवल पुराने मुकदमों को ही सूचीबद्ध करने और उसमें वकील की उपस्थिति जरूरी नहीं रखने का प्रावधान किया है। इसके अलावा मामले में गठित कमेटी की रिपोर्ट भी अभी तक नहीं आई है। ऐसे में जयपुर और जोधपुर के वकीलों का बहिष्कार पर जाना उचित नहीं है। बहिष्कार पर जाना समस्या का समाधान नहीं है। समस्या को आपसी संवाद से सुलझाया जा सकता है। जब वकील बहिष्कार करते हैं तो यह पक्षकारों के शीघ्र न्याय के अधिकार की अवहेलना होती है। अधिवक्ता संशोधन अधिनियम, 2025 भी वकीलों को ऐसा करने से रोकता है। अदालत ने कहा कि विरोध का अधिकार अन्य नागरिकों के अधिकारों के साथ संतुलित होना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने आदेश की कॉपी बार कौंसिल ऑफ इंडिया और बार कौंसिल ऑफ राजस्थान को भेजी है।

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