Rajasthan News: राजस्थान में सिस्टम की लापरवाही की एक तस्वीर सामने आई है। जिसके बाद हाईकोर्ट ने प्रशासन को जमकर फटकार लगाई। दरअसल कोरोना महामारी के दौरान अपनी जान दांव पर लगाकर ड्यूटी करने वाली एक वरिष्ठ सहायक की मौत के 4 साल बाद भी उनके परिवार को मुआवजा नहीं मिला है। जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए प्रमुख राजस्व सचिव, वित्त सचिव और टोंक कलेक्टर को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

कंट्रोल रूम में ड्यूटी करते हुए गई थी जान
दरअसल, यह पूरा मामला टोंक तहसील कार्यालय में कार्यरत गाती देवी से जुड़ा है। साल 2020 में जब पूरी दुनिया घरों में कैद थी, तब गाती देवी कोरोना कंट्रोल रूम में मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही थीं। इसी दौरान वे संक्रमित हुईं और 24 नवंबर 2020 को इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। उनके बेटे विजय कुमार भारतीय ने अब इंसाफ के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
70 लाख की सहायता, फाइलों में दबी रह गई घोषणा
गौरतलब है कि राजस्थान सरकार के वित्त विभाग ने 11 अप्रैल 2020 को एक बड़ा आदेश जारी किया था। इसके तहत ड्यूटी के दौरान कोरोना से मौत होने पर 50 लाख रुपये का विशेष मुआवजा तय था। वहीं पेंशन नियमों के तहत 20 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता का प्रावधान था। इस तरह कुल मिलाकर परिवार को 70 लाख रुपये की मदद मिलनी थी।
कलेक्टर की सिफारिश के बाद भी खाली हैं हाथ
सूत्रों के अनुसार, परिवार ने मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं। टोंक कलेक्टर के निर्देश पर बाकायदा एक कमेटी बनी, जिसने 14 मई को मुआवजा देने की सिफारिश भी कर दी थी। लेकिन फाइलें सचिवालय के गलियारों में ऐसी दबीं कि आज तक पीड़ित परिवार को एक रुपया भी नसीब नहीं हुआ।
हाईकोर्ट की सख्ती
अदालत ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए अधिकारियों से पूछा है कि आखिर इतनी देरी क्यों हुई? वहीं प्रदेश के अन्य सरकारी कर्मचारियों में भी नाराजगी है जो कोरोना काल में अग्रिम पंक्ति में खड़े थे। हाईकोर्ट के नोटिस के बाद अब सचिवालय में फाइलों की धूल झाड़ी जाने लगी है। इस फैसले से उन अन्य परिवारों को भी हिम्मत मिली है जिन्हें अब तक सरकारी सहायता का इंतजार है।
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