Rajasthan News: राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ आदिवासी बहुल जिलों को मिलाकर एक अलग भील प्रदेश बनाने की मांग फिर से सुर्खियों में है। यह मांग जोर-शोर से उठाई जा रही है, खासकर बाप पार्टी के सांसद राजकुमार रोत की ओर से, जिन्होंने हाल ही में इस प्रस्तावित राज्य का नक्शा भी जारी किया। लेकिन जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है, वो ये कि इस आंदोलन की गूंज सबसे ज्यादा मानगढ़ धाम से सुनाई देती है।

राजस्थान-गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ धाम भील समुदाय के लिए सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, यह उनकी शहादत, संघर्ष और पहचान का प्रतीक है। यह वही जगह है जहां 17 नवंबर 1913 को गोविंद गुरु के नेतृत्व में हज़ारों भील आदिवासी ब्रिटिश हुकूमत और ज़मींदारी शोषण के खिलाफ जुटे थे। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे इन आदिवासियों पर अंग्रेज़ी सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। करीब 1500 भील आदिवासी मारे गए इसे इतिहास में मानगढ़ नरसंहार कहा गया और कई इसे भारत का दूसरा जलियांवाला बाग कांड भी मानते हैं।
गोविंद गुरु ने केवल विद्रोह नहीं किया, उन्होंने आदिवासियों में सामाजिक सुधार, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और अधिकारों की चेतना जगाई। उनका भगत आंदोलन भील समाज को जोड़ने और संगठित करने का आधार बना। यही चेतना आज भी मानगढ़ धाम में जिंदा है और यही वजह है कि जब भी भील प्रदेश की बात होती है, शुरुआत यहीं से होती है।
भील प्रदेश: क्या है मांग का आधार?
भील प्रदेश की मांग कोई नई बात नहीं है। इसकी जड़ें 108 साल पुराने आदिवासी आंदोलन में हैं। चार राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल 42 जिलों को मिलाकर एक नया राज्य बनाने की बात कही जाती है। मांग करने वालों का तर्क है कि इतने वर्षों बाद भी भील समुदाय को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उचित हिस्सा नहीं मिला है। वे खुद को इन राज्यों की व्यवस्था में उपेक्षित मानते हैं।
ये हैं वे जिले जिनसे भील प्रदेश का नक्शा बनाया जा रहा है
- गुजरात: दाहोद, छोटा उदयपुर, नर्मदा, तापी, नवसारी, वलसाड़, दमन-दीव, दादरा नगर हवेली, बनासकांठा, सावरकांठा, अरावली, महिसागर, वडोदरा, भरूच, पंचमहल, सूरत
- राजस्थान: बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, जालोर, बाड़मेर, पाली
- महाराष्ट्र: नंदूरबार, धुले, जलगांव, नासिक, पालघर, ठाणे
- मध्यप्रदेश: झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन, बुरहानपुर, खंडवा, नीमच, मंदसौर, रतलाम
मानगढ़ धाम सिर्फ ऐतिहासिक घटना का स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता का केन्द्र है। यह उनके संघर्ष की ज़मीन है, जहां उन्होंने पहली बार सामूहिक रूप से अंग्रेजी हुकूमत और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। यह धाम आज भी भील समुदाय की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक एकजुटता का केंद्र है। यहां हर साल जुटने वाले हज़ारों लोग सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं देते, बल्कि अपने हक और पहचान की बात भी दोहराते हैं।
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