विशेष रिपोर्ट : …जब जनजातियों की दुर्दशा वाली ख़बर पर संज्ञान लेकर सोनिया गांधी के साथ गरियाबंद पहुँच गए थे राजीव गांधी…कहानी कुल्हाड़ीघाट और ‘बल्दी’ की

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वैभव बेमेतरिहा/ पुरुषोत्तम पात्रा। आज के दौर में जहाँ प्रधानमंत्री प्रेसवार्ता में सवालों का जवाब नहीं देते वहाँ आप उस दौर की पत्रकारिता को भी जानिए जब ख़बर और पत्रकार की अहमियत इतनी होती थी कि उनकी ख़़बरें प्रधानमंत्री तक को उस पर संज्ञान आने को मजबूर कर देते थे. छत्तीसगढ़ में ऐसी एक ख़बर पर संज्ञान लेकर गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट पहुँच गए थे तात्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी. ख़बर थी जनजातियों की दुर्दशा पर. रिपोर्ट तैयार की थी प्रदेश के प्रख्यात पत्रकार रहे राजनारायण मिश्र ने. राजनारायण मिश्र  ने आदिवासी अंचल गरियाबंद में जनजातियों की दुर्दशा पर ऐसी रिपोर्ट लिखी थी कि दिल्ली की हुकूमत में इसकी गूँज हो उठी. बात सन् 1986-87 की है. उन्ह दिनों अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होते थे मोतीलाल वोरा. राजीव गांधी ने मोतीलाल वोरा से गरियाबंद की जानकारी मांगी फिर उन्होंने वहां जाने की बात कही. राजीव गांधी ने खुद गरियाबंद जाकर जमीनी हक़ीकत की जानकारी लेने की तैयारी कर ली.

इस तरह राजीव गांधी अपनी पत्नी सोनिया गांधी और मोतीलाल वोरा को साथ लेकर गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट पहुँचे. उस गांव में जिसकी रिपोर्ट राजनारायण मिश्र ने प्रकाशित की थी.  प्रधानमंत्री का दुरस्त अंचल और अभावहीन जनजातियों के बीच पहुँचने की ख़बर की सुर्खियां बनी. राजीव गाँधी ने कुल्हाड़ीघाट को गोद लेने का ऐलान किया. समय के साथ गाँव की तस्वीरें तो कुछ हद तक बदली लेकिन उनती नहीं जिसकी उम्मीद एक प्रधानमंत्री के दौरे के बाद से गांववालों ने लगाई थी. विकास की रफ़्तार वैसी रही जैसे अन्य गांवों के विकास में थी. ये और बात थी कि राजीव गांधी के यहां आने से इस गाँव में सुविधाएं थोड़ी ज्यादा हो गई. हालांकि कोशिश ये थी कि कुल्हाड़ीघाट के साथ-साथ जनजातियों की दुर्दशा को बदलने की. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और विकास जैसे कुल्हाड़ीघाट आकर ही ठहर गया. आज भी कुल्हाड़ीघाट के आस-पास के दर्जनों कमार जनजातियों वाले गाँव विकास की राह तक रहे हैं.

जिनके हाथों से राजीव-सोनिया ने चखा था तेंदू का स्वाद, आज भी उनकी ज़िंदगी बे-स्वाद
कुल्हाड़ीघाट गाँव में सोनिय गांधी और राजीवगांधी को कमार जनजाति की महिला बल्दी ने तेंदू खाने को दिया है. बड़े प्यार से तात्कालीन प्रधानमंत्री ने बल्दी के हाथों से तेंदू का स्वाद चखा था. शायद बल्दी के लिए यह खुद को माता शबरी की तरह अनुभव करने जैसा था. लेकिन यह अनुभव भर ही था हक़कीत कतई नहीं. क्योंकि बल्दी की ज़िन्दगी तो आज भी बे-स्वाद ही है. बल्दी आज भी सरकारी योजनाओं से वंचित है. उनके हिस्से एक अदद सरकारी आवास तक नहीं. जबकि पंचायत में 2016-17, 2017-18 में 84 प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत हुए लेकिन इसमें बल्दी का नाम नहीं है. इससे पहले इंदिरा आवास के 200 आवास स्वीकृत हुए थे उसमें भी बल्दी के नाम नहीं थे. बल्दी राजीव गांधी के समय भी झोपड़ी में थी बल्दी आज नरेन्द्र मोदी के समय भी झोपड़ी में है. 33 साल भी बल्दी की किस्मत नहीं बदली. बल्दी के जीवन का इसे दुर्भाग्य कहिए कि 5 साल पहले उनके इकलौते बेटे की बीमारी से मौत हो गई थी. फिलहाल 4 पोते और बहू के सहारे बल्दी अपने जीवन के अंतिम पड़ाव को जी रही है. ग्राम पंचायत सचिव प्रेम ध्रुव बताते हैं कि सर्वे में बल्दी का नाम नहीं जुड़ पाया इसलिए वह आवास पाने से वंचित रह गई हैं.

बल्दी के साथ सब तस्वीर लेते हैं, तक़दीर नहीं बदलते
भारत रत्न राजीव गांधी को अपने हाथ से तेंदू खिलाने वाली बल्दी आज कुल्हाड़ीघाट की पहचान के साथ इलाके की आन-बान-शान तो है लेकिन सिर्फ़ तस्वीरें लेने तक. राजीव की याद लिए गांव में लोग उनके साथ तस्वीरे खींचा अपनी यादें समेट तो लाते हैं, लेकिन बल्दी का हमदर्द नहीं बन पाते हैं. खास तौर पर वे कांग्रेसी भी जो उनके पास विशेष तौर पर पहुँचते हैं. 21 मई 2019 को भी बड़ी संख्या में कांग्रेसी राजीव गाँधी को याद करते हुए कुल्हाड़ीघाट पहुँचे. बल्दी से मिले. बल्दी का सम्मान भी उन्होंने किया. कुछ उपहार भी भेंट किए, साथ में तस्वीरें भी ली. लेकिन बल्दी को जो चाहिए वह आज भी अधूरी है. गाँव के सरपंच बनसिंह सोरी बताते हैं कि विकास के मामले में आज कुल्हाड़ीघाट काफी पिछड़ गया है. न यहाँ जोगी शासकाल में विकास हुआ न रमन सरकार में गांव की तरक्की हो पाई. गांव के ज्यादातर लोग बाँस से जुड़े व्यवसाय करते हैं, लेकिन बिचौलिए के हाथों अपने काम का दाम लेने को मजबूर हैं क्योंकि सरकारी मदद नहीं है. फिलहाल गाँववाले फिर किसी प्रधानमंत्री का यहाँ आने का इंतजार कर रहे हैं, प्रधानमंत्री न सही तो मुख्यमंत्री ही पहुँच जाए. हो सकता कुछ समय के लिए ही सही गाँव कुछ चमक जाए, कुछ बदल जाए.

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