नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भाषा और संस्कृति को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कभी भारत में संवाद की मुख्य भाषा संस्कृत हुआ करती थी, लेकिन आज हालात बदल गए हैं। भागवत ने कहा, ‘आज स्थिति यह है कि एक अमेरिकी प्रोफेसर हमें संस्कृत पढ़ा रहा है। जबकि इसकी जिम्मेदारी हमारी होनी चाहिए कि हम दुनिया को संस्कृत सिखाएं। हमारे बच्चे अब अपनी भाषा भूल रहे हैं। वे घर में भी आधी अंग्रेजी और आधी अपनी भाषा बोलते हैं।’

‘संत और साधु भी अब अंग्रेजी में बोलने लगे हैं’

उन्होंने कहा कि कई भारतीयों को तो अपनी मातृभाषा के मूल शब्द भी नहीं पता। यही नहीं, संत और साधु भी अब अंग्रेजी में बोलने लगे हैं। उन्होंने इसे समय के बदलाव के रूप में स्वीकार तो किया, लेकिन साथ ही इसे भाषा के प्रति बदलते रवैये का संकेत भी बताया। भागवत ने सुझाव दिया कि यदि लोग घरों में साफ और सही मातृभाषा बोलना शुरू करें, तो हालात में सुधार आ सकता है।

पूर्वोत्तर में बदलाव की दोपहर आ चुकी है- भैय्याजी जोशी

वहीं पुणे में एक कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ नेता सुरेश भैय्याजी जोशी ने पूर्वोत्तर भारत की स्थिति पर बात की। उन्होंने कहा कि अभी भी कई चुनौतियां हैं, लेकिन बीते 60-70 वर्षों में जो काम हुआ है, उसने वहां भरोसा और स्थिरता बढ़ाई है। उन्होंने कहा, ‘हम यह नहीं कह सकते कि पूर्वोत्तर की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं, लेकिन यह भी नहीं कह सकते कि वे कभी हल नहीं होंगी। अब हम सुबह की रोशनी नहीं, बल्कि परिवर्तन की दोपहर में हैं।’

‘कमजोर हो रही हैं अलगाववादी और देश-विरोधी ताकतें’

उन्होंने दावा किया कि अब वहां अलगाववादी और देश-विरोधी ताकतें कमजोर हो रही हैं। स्थानीय लोग यह समझने लगे हैं कि बाहरी शक्तियों ने उन्हें गलत दिशा दिखाई थी, और सही रास्ता वही है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दिखाया। भैय्याजी जोशी के मुताबिक, विद्या भारती, सेवा भारती और विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थाओं ने वहां शिक्षा, सेवा और सामाजिक कार्यों के जरिए लोगों के बीच दूरी मिटाने में बड़ा योगदान दिया। उन्होंने कहा, ‘आज पूर्वोत्तर पहले से अधिक सुरक्षित है, क्योंकि जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदायों के बीच की दूरी कम हुई है।’

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