RSS 100 Year Celebration: आरएसएस (संघ) के 100 साल पूरे होने के अवसर पर दिल्ली में तीन दिनों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यक्रम चला. विज्ञान भवन में 26 से 28 अगस्त तक आयोजित इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में हजारों लोग शामिल हुए. कार्यक्रम का विषय था ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’. कार्यक्रम के अंतिम दिन गुरुवार को सरसंघचालक मोहन भागवत ने कई मुद्दों पर अपने विचार रखे. इस दौरान उन्होंने काशी और मथुरा मंदिर आंदोलन के विषय में आरएसएस की सहभागिता को लेकर अपनी बात रखी.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने घोषणा की कि राम मंदिर एकमात्र ऐसा आंदोलन था जिसका संघ ने समर्थन किया था और वह काशी और मथुरा सहित ऐसे किसी अन्य अभियान का समर्थन नहीं करेगा. भागवत ने स्पष्ट किया कि आरएसएस के स्वयंसेवक ऐसे आंदोलनों में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ एकमात्र राम मंदिर आंदोलन में सीधे तौर पर जुड़ा था. अब संघ किसी भी आंदोलन में शामिल नहीं होगा.

इसे भी पढ़ें : Best Performing CM List: हिमंता बिस्वा सरमा, विष्णु देव साय, योगी आदित्यनाथ, मोहन यादव, भूपेंद्र भाई पटेल, मोहन चरण माझी… सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले 10 सीएम की लिस्ट में सबसे ज्यादा बीजेपी के, हेमंत-ममता ने भी चौंकाया, देखें पूरी लिस्ट

धर्म, संस्कृति और पूजा पद्धति को लेकर पूछे गए सवाल पर सरसंघचालक ने कहा कि हिंदू कहो या हिंदवी एक ही बात है. हिंदू मुस्लिम सब एक ही है. क्या बदली सिर्फ पूजा बदली है और कुछ नहीं. हमारा आइडेंटिटी एक ही है. हमारी संस्कृति, पूर्वज एक ही हैं. सिर्फ अविश्वास के चलते मन में शंका होता है दोनों तरफ. इस्लाम यहां है और यहां रहेगा ये हिंदू सोच है. दोनों धर्मों में ये कॉन्फिडेंस जगाना होगा. पहले भी कहा गया है कि रिलीजन बदलने से कौम नहीं बदलती. शहरों और रास्तों का नाम आक्रांताओं के नाम नहीं होने चाहिए. आप ये मत समझें कि हमने मुसलमानों के लिए बोला है. जो देशभक्त मुस्लिम हैं, उसके नाम पर रखना चाहिए. मुस्लमान को भी समझना होगा हम पूजा पद्धति से अलग हैं. जब ये भावना मुस्लिम समाज में पैदा हो जाएगा तो हिन्दू समाज तो भाईचारे के लिए सदा से राह देख रहा है.

भाषा विवाद पर भागवत ने कहा कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्र भाषाएं हैं. व्यवहार के लिए संपर्क के लिए एक भारतीय भाषा होनी चाहिए, वह विदेशी ना हो. भाषा को लेकर विवाद नहीं करना चाहिए. हर भाषा में एक लंबी और अच्छी परंपरा है, वो सीखना चाहिए. इसकी शिक्षा मिशनरी स्कूलों और मदरसा हर जगह मिलनी चाहिए. मैं आठवीं के क्लास में था, तब पिता जी ने मुझे ऑलीवर ट्विस्ट पढ़ाया. कई इंग्लिश नॉवेल्स मैं पढ़ चुका हूं, इससे मेरे हिंदुत्व प्रेम में अंतर नहीं आया. लेकिन हमने ऑलीवर ट्विस्ट पढ़ा और प्रेमचंद की कहानियां छोड़ दीं, ये अच्छा नहीं है.