Rupee Slides To All-Time Low : 19 मार्च को भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आई रुकावटों ने इसके नुकसान को और बढ़ा दिया. यह एक ऐसी स्थिति है जो भारत के विकास-मुद्रास्फीति संतुलन को अस्थिर करने का खतरा पैदा करती है.

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 0.65% गिरकर 93.24 के स्तर पर पहुंच गया. यह बुधवार को दर्ज किए गए अपने पिछले सबसे निचले स्तर 92.63 से भी नीचे का स्तर है. अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से स्थानीय मुद्रा में लगभग 2% की गिरावट आई है.

खाड़ी क्षेत्र में महत्वपूर्ण ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमलों के बाद गुरुवार को तेल की कीमतें बढ़कर लगभग $120 प्रति बैरल तक पहुंच गईं. हालांकि शुक्रवार को कीमतों में कुछ नरमी आई. प्रमुख यूरोपीय देशों और जापान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के प्रयासों में शामिल होने की पेशकश की है, जबकि अमेरिका ने तेल की आपूर्ति बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं.

रुपये पर दबाव जल्द कम होने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि तेल की कीमतों में अचानक उछाल की चिंताओं के चलते विदेशी निवेशकों ने मार्च में अब तक घरेलू इक्विटी से $8 बिलियन से अधिक की राशि निकाल ली है, जो जनवरी 2025 के बाद से सबसे बड़ा मासिक बहिर्प्रवाह (outflow) है. अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा की कीमतों में लगातार वृद्धि भारत की आर्थिक वृद्धि को धीमा कर सकती है और मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती है.

रुपये पर इसका क्या प्रभाव है?

  • तेल का झटका: ईरान संघर्ष की शुरुआत के बाद से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 40% की वृद्धि हुई है.
  • डॉलर की मांग: बढ़ते आयात बिलों के कारण अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ रही है.
  • विदेशी बहिर्प्रवाह: विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं.
  • मजबूत डॉलर: बढ़ते जोखिमों के बीच, वैश्विक स्तर पर ‘सुरक्षित निवेश की ओर रुझान’ (flight-to-safety) के कारण अमेरिकी मुद्रा को मजबूती मिल रही है.

रुपये के बारे में एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?

एक्सिस सिक्योरिटीज में रिसर्च हेड राजेश पाल्विया ने कहा- “फेड का ब्याज दरों को 3.5–3.75% के दायरे में बनाए रखने का फैसला—साथ ही महंगाई के ऊंचे अनुमान और ईरान को लेकर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव—एक ‘लंबे समय तक ऊंची दरें’ वाले चक्र को और मजबूत करता है, जो बाजार की उम्मीदों से भी आगे बढ़ रहा है.

भारत के लिए, मुख्य फैक्टर अमेरिकी डॉलर की लगातार मजबूती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है और FII के बाहर जाने (outflows) में फिर से तेज़ी आ सकती है, खासकर डेट मार्केट में. भारत की घरेलू ग्रोथ के बुनियादी तत्व वैश्विक दरों में उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक सुरक्षा कवच का काम करते रहेंगे. हालांकि, दरों के प्रति संवेदनशील उभरते बाजारों को बीच-बीच में कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि 2026 में दरों में कटौती की उम्मीदें और आगे खिसक गई हैं.