हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का पर्व विशेष आस्था और परंपराओं से जुड़ा हुआ माना जाता है. यह दिन माता शीतला की पूजा के लिए समर्पित होता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धा के साथ माता की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन माता को अर्पित किया जाता है. कई क्षेत्रों में इस पर्व को बसौड़ा या बसोड़ा के नाम से भी जाना जाता है.

क्यों नहीं जलाया जाता चूल्हा?
शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) के दिन चूल्हा नहीं जलाने की खास परंपरा है. मान्यता है कि इस दिन माता शीतला को ठंडा भोजन (बासी खाना) अर्पित किया जाता है. इसलिए एक दिन पहले यानी सप्तमी के दिन ही भोजन बनाकर रख लिया जाता है. अगले दिन वही ठंडा भोजन माता को भोग लगाया जाता है और परिवार के लोग भी उसी भोजन को ग्रहण करते हैं. इसे कई जगहों पर बसोड़ा भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता शीतला का संबंध शीतलता, स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा से माना जाता है. इसलिए इस दिन आग नहीं जलाई जाती और ठंडे भोजन का सेवन किया जाता है.
महत्वपूर्ण जानकारी
कब है शीतला अष्टमी
शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का व्रत बुधवार, 11 मार्च को मनाया जा रहा है. हिंदू पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च को रात 1.54 मिनट से होगी. समापन 12 मार्च को सुबह 04.19 मिनट पर होगा.
पूजा का शुभ मुहूर्त
इस दिन सुबह 6.36 मिनट से शाम 6.27 मिनट तक पूजा का शुभ समय माना गया है. इसी समय में श्रद्धालु माता शीतला की पूजा-अर्चना करते हैं.
क्यों कहा जाता है बसौड़ा
कई राज्यों में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) को बसौड़ा कहा जाता है. ‘बसौड़ा’ शब्द का अर्थ बासी या ठंडा भोजन होता है, क्योंकि इस दिन माता को ठंडा भोजन अर्पित करने की परंपरा है.
ठंडा भोजन चढ़ाने की परंपरा
धार्मिक कथाओं के अनुसार एक वृद्ध महिला ने माता शीतला को ठंडा भोजन अर्पित किया था, जिससे माता प्रसन्न हुईं और तभी से ठंडा भोजन अर्पित करने की परंपरा मानी जाती है.
पूजा का महत्व
मान्यता है कि माता शीतला की पूजा से चेचक, खसरा और त्वचा से जुड़ी बीमारियों से रक्षा होती है. साथ ही परिवार की सुख-समृद्धि और बच्चों की लंबी आयु की कामना की जाती है.
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