सुकमा नक्सल मुठभेड़ ग्राउंड रिपोर्ट-2 : हिड़मा के एल(L) नुमा एंबुश में फंस गए थे जवान, ताड़मेटला से बड़ा हो सकता था कांड !

शिवा यादव/विनोद दुबे की विशेष रिपोर्ट

रायपुर। सुकमा नक्सल मुठभेड़ की ग्राउंड रिपोर्ट में अब कहानी हिड़मा के उस चक्रव्यूह की जिसमें सैकड़ों की संख्या में हमारे जवान फंस गए थे. इस चक्रव्यूह में जवानों ने बहादुरी के साथ मुकाबला किया, लेकिन जंग के मैदान में हमें एक बड़ी क्षति भी हुई. आखिर ये क्षति इतनी बड़ी हुई कैसे, क्यों हुई ? परिस्थितियाँ क्या जवानों के अनुकूल थी ? क्या वाकई जवानों के पास हिड़मा को लेकर पुख्ता इनपुट थे ? क्या हिड़मा की ओर से रचे गए चक्रव्यूह की जानकारी थी ? इन सब बातों की पड़ताल करती हमारे संवाददाता शिवा की ग्राउंड रिपोर्ट-2 में पढ़िए आगे की वो कहानी….

http://सुकमा नक्सल मुठभेड़ की ग्राउंड रिपोर्ट : जानिये रिपोर्टर शिवा से कब, कहां, कैसे किन परिस्थितियों में हुई घटना, हिड़मा के चक्रव्यूह में कैसे फंसे जवान ?

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान शिवा ने अलग-लअग माध्यमों से कई तरह की जानकारियाँ जुटाई. शिवा बताता है कि ऑपरेशन प्रहार चला रही पुलिस को इंटेलीजेंस से एक बड़ी जानकारी मिली. इंटेलीजेंस को मिली सूचना के मुताबिक नक्सलियों के सबसे आक्रामक लड़ाकू बटालियन नंबर एक के कमांडर हिड़मा, देवा सहित वारंगल से कुछ बड़े नक्सलियों की टीम कसालपाड़ा, एलमागुड़ा, मिनपा के बीच मौजूद जंगलों में मौजूद हैं. इंटेलीजेंस को मिले इस इनपुट ने आला अधिकारियों के कान खड़े कर दिये. हिड़मा को घेरने रणनीति बनाई गई.

दिनांक 20 मार्च, दिन शुक्रवार को डीआरजी, कोबरा और एसटीएफ के 450 जवानों के साथ तीन टुकड़ियों के साथ तैयार हुई. जवानों की इन टुकड़ियों को चिंतागुफा और बुरकापाल के रास्ते रवाना किया गया. फोर्स अपने साथ खाने-पीने के सामान के साथ ही युद्ध के दौरान रखे जाने वाले तमाम हथियार और मेडिकल इक्विपमेंट लेकर निकले. शुक्रवार की शाम सर्चिंग करते हुए फोर्स की तीनों टुकड़ियाँ एलमागुंडा के नजदीक एक पहाड़ी के पास जाकर रुक गई. जवानों रात वहीं काटी.

तारीख़ 21 मार्च, दिन शनिवार को सुबह-सुबह फोर्स की टुकड़ियां एलमागुंडा से सर्चिंग के लिए निकली. फोर्स को इसी जगह की इनपुट थी. हालांकि फोर्स को यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं मिला. जबकि दूसरी तरफ हिड़मा को जवानों के उसके मांद में घुसने की ख़बर मिल गई थी. हिड़मा को ये भी जानकारी हो चुकी थी कि जवान कहाँ रात में ठहरे थे. वे किस तरह से आगे बढ़ रहे हैं. इधर हिड़मा के चक्रव्यूह से बेख़बर आगे बढ़ते जा रहे थे. तभी अचानक जवानों की मुठभेड़ नक्सलियों की एक छोटी टूकड़ी के साथ होती है. मुठभेड़ के दौरान जवान नक्सलियों पर भारी पड़ने लगे. जवानों की आक्रमता को देखते हुए कुछ देर बाद नक्सली वहाँ से भाग खड़े हुए.

माना जा रहा है कि यह मुठभेड़ फोर्स का ध्यान भटकाने की नक्सलियों की एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा रही होगी. इस मुठभेड़ के बाद फोर्स आगे बढ़ने लगी. लेकिन जवान तब तक ये नहीं समझ पाए थे कि अब वे हिड़मा के घेरे में हैं. हिड़मा का यह चक्रव्यूह एल(L) नुमा एंबुश था. इससे अंजान डीआरजी और एसटीएफ की एक टूकड़ी मिनपा होते हुए आगे निकली गई. ठीक उस जगह पर जहाँ पर नक्सली घात लगाएं पहाड़ी पर बैठे हुए थे.  लेकिन जवान भी संभावित हमले को लेकर चौकन्ने थे. तभी एक जवानों की नज़र एक महिला नक्सली पर पड़ी. लेकिन इससे पहले कि जवान फायरिंग कर पाते नक्सलियों ने ताबातोड़ फायरिंग शुरू कर दी.  नक्सलियों द्वारा जवानों के ऊपर अचानक की गई फायरिंग से फोर्स को संभलने का मौका नहीं मिला और गोलियों से बचते हुए मोर्चा संभालने लगे. तब तक कई जवान नक्सलियों की गोली बारी का शिकार हो गए.

मुठभेड़ की जानकारी होते ही दूसरी टीम बैकअप देने के लिए निकली. मगर इससे पहले वह कोई मदद कर पाती, नक्सलियों की फायरिंग बढ़ गई. मोर्चा संभाले हुए वीर जवानों ने नक्सलियों की गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दिया. गोलीबारी में शहीद जवानों का  वायरलेस नक्सलियों ने अपने कब्जे में ले लिया. नक्सली वायरलेस से जवानों को ललकारने लगे..नक्सलियों ने जवानों को ललकारते हुए पीएलजीए के सामने समर्पण करने के लिए कहा. जवानों ने अपना वायरलेस सेट बंद कर उन्हें मुहतोड़ जवाब देने लगे.

दोनों ही ओर से जारी इस भीषण मुठभेड़ कई मौकों पर जवान भारी पड़ते रहे. कई नक्सलियों को जवानों ने मार गिराया. मारे गए नक्सलियों में महिलाओं की संख्या ज्यादा थी. लेकिन पहाड़ी पर तैनात नक्सलियों ने भी हमला तेज कर दिया और जवानों के ऊपर बम बरसाने लगे. रॉकेट लॉंचर और बम से जवान तितर-बितर होने लगे, उन्हें संभवने का मौका नहीं मिला. कई जवान इस बीच घायल हो गए. जवानों ने अपने घायल साथियों को बचाने की कोशिश की. वे उन्हें बाहर निकालने में लग गए. उधर नक्सली ऊपर टेकरी से अंधाधुन फायर करते. कई जवान नक्सलियों के गोली का शिकार हो शहीद हो गए. फायरिंग देर शाम तक चलती. हिड़मा का नक्सली बटालियन बेकाबू हो चला था. वे जंगल में मौजूद नक्सलियों को सभी तरफ से घेरने लगे. लेकिन जवान धीरे-धीरे घायलों को लेकर कैम्प की ओर लौटने लगे. कुछ जवान देर रात तक लौट पाए. नक्सली फायरिंग के साथ ही लगातार बमों की बारिश कर रहे थे कि जवान अपने शहीद साथियों का शव भी नहीं उठा पा रहे थे.

मौके से जो जवान लौटे उन्होंने बताया कि 500 नक्सली थे जो चारों ओर से हमला कर रहे थे. जिनमें कई नक्सली बुलेटप्रूफ जैकेट और बुलेटप्रूफ हेलमेट भी लगा रखे थे.

शिवा कहता है कि नक्सलियों की संख्या करीब 500 से ज्यादा थी जो चारो ओर से लगातार हमला कर रहे थे. जवान उनका मुहतोड़ जवाब दे रहे थे, लेकिन एंबुश लगाए नक्सली लगातार उन पर हावी होते जा रहे थे. शहीद जवानों को बाहर लाने की कोशिश में जुटे जवान घायल हो रहे थे. अब घायल जवानों को बाहर निकालने की चुनौती थी. इन हालातों के बीच साथी जवानों को शहीदों का शव छोड़ घायलों को लेकर निकलना पड़ा. क्योंकि अगर वो वापस नहीं लौटते तो शायद घटना इससे भी कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती थी.

शिवा की ये जानकारी बेहद चौंकाती है. शिवा कहता है कि उन्होंने कई लोगों से बातचीत की. इस बातचीत में पता चला कि हिड़मा ताड़मेटला कांड से बड़ी घटना को अंजाम देने के फिराख में था. हिड़मा के साथ नक्सलियों की संख्या इतनी थी, कि जवानों को बड़ा नुकसान पहुँचा सकते थे. लेकिन समय रहते जवान वहाँ से निकल गए.

शिवा यह भी कहता है कि उन्होंने कई मुठभेड़ों की रिपोर्टिंग की है, लेकिन यह घटना इलाके की कई बड़ी घटनाओं से अलग थी. हमारे जवानों पूरी बहादुरी के साथ मुकाबला किया. लेकिन जवानों को भेजने से लेकर हिड़मा की मौजूदगी होने के साथ एंबुश की जानकारी नहीं होने के बीच एक बड़ी रणनीतिक चूक नज़र आती है. वही रणनीतिक चूक जिसकी बात जिले के कांग्रेस विधायक और मंत्री कवासी लखमा भी कह रहे हैं.  कवासी लखमा ने इस घटना को लेकर सवाल उठाते हुए कहा है कि एक बड़ी चूक से एक बड़ी घटना हुई है.

शिवा की ग्राउंड रिपोर्ट के बाद कई सवाल खड़े होते हैं. सवाल ये कि अगर ये रणनीति चूक है, तो ये चूक कहाँ और किस स्तर से हुई है ? सवाल ये भी कि हिड़मा की मौजूदगी के साथ क्या यह सूचना नहीं मिल पाई थी कि कितनी संख्या में नक्सली उनके साथ हैं ? सवाल ये भी कि एंबुश में अगर जवान फँसे तो फिर क्या होगा ?  क्या उन्हें मदद पहुँचाई जा सकती है ? फिलहाल ये तमाम सवाल उठते ही रहेंगे. इन उठने वाले सवालों से अलग नक्सलियों के खात्मे की कोई कारगर रणनीति बने तो बात कुछ और है.

 

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