Supreme court On Anti Dowry Law: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान दहेज विरोधी कानून पर बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह देखते हुए कि दहेज की सामाजिक बुराई अभी भी मौजूद है, यह दहेज विरोधी कानूनों के प्रभाव न पड़ने को दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की उसमें 20 साल की एक युवती को TV, बाइक और 15,000 कैश के लिए के लिए उसके पति और सास ने कैरोसीन डालकर जिंदा जला दिया था। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने दहेज हत्या के मामले में सुनवाई के दौरान इस गंभीर मुद्दे पर टिप्पणी की।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दहेज के मामलों से निपटने के लिए सभी के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर जोर देते हुए हाईकोर्ट्स को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-बी और 498-ए के तहत लंबित मामलों की संख्या (सबसे पुराने से लेकर सबसे नए तक) का पता लगाने समेत कई निर्देश जारी किए ताकि उनका शीघ्र निपटान किया जा सके। भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी दहेज हत्या से संबंधित है, वहीं धारा 498-ए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला से क्रूरता से संबंधित है।
जस्टिस करोल एवं जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने मामले में एक आदमी और उसकी 94 साल की मां को दोषी ठहराया। मामला वर्ष 2001 में एक 20 साल की लड़की को कलर टेलीविजन, एक मोटरसाइकिल और 15,000 रुपये नकद की मांग पूरी न करने पर जलाकर मार दिए जाने का था। लगभग 25 साल बाद इस मामले का निपटारा करते हुए कोर्ट ने पति को उम्रकैद की सजा सुनाई। हालांकि, मां की बुढ़ापे की उम्र को देखते हुए उसे जेल भेजने से मना कर दिया।
बदलाव की बताई जरूरत
बेंच ने कहा कि दहेज कानून की अप्रभाव और दुरुपयोग के बीच यह उतार-चढ़ाव एक न्यायिक तनाव पैदा करता है, जिसे तत्काल हल करने की आवश्यकता है। हालांकि, इस तत्काल समाधान पर जितना जोर दिया जाए, उतना कम है। साथ ही यह पहचानना भी जरूरी है कि जब दहेज देने और लेने की बात आती है, तो दुर्भाग्य से इस प्रथा की समाज में गहरी जड़ें हैं। इसलिए, यह रातों-रात बदलने वाली बात नहीं है, बल्कि इसमें सभी संबंधित पक्षों – चाहे वह विधायिका हो, कानून प्रवर्तन, न्यायपालिका, नागरिक समाज संगठन आदि की ओर से ठोस प्रयास की आवश्यकता है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला 24 साल पुराना है, साल 2001 में नसरीन को उसके पति और ससुराल वालों ने बहुत परेशान किया और आखिर में उस पर कैरोसिन का तेल ड़ालकर आग लगा दी। जब नसरीन के मामा पहुंचे तब तक नसरीन मर चुकी थी. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने अजमल और उसकी मां को आईपीसी की धारा 304 बी और 498ए के तहत जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दोनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी, जहां हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर, 2003 को यह कहते हुए राहत दे दी कि नसरीन के मामा घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं इसलिए उनकी गवाही नहीं मानी जा सकती। इसके बाद यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें स्वीकार कर लीं और मामले में अजमल और उसकी मां की दोषसिद्धि को बहाल कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने 94 वर्षीय महिला दोषी को कारावास की सजा नहीं दी। कोर्ट ने अजमल को निचली अदालत की ओर से दी गई आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए चार हफ्ते के अंदर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि भले ही इस मामले में आरोपियों को आखिरकार सजा मिल गई है, लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ऐसा नहीं होता है।
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