अभय मिश्रा, मऊगंज। फिल्म ‘पुष्पा’ में जिस तरह लाल चंदन की तस्करी के जाल को दिखाया गया था, कुछ वैसा ही रोंगटे खड़े कर देने वाला हकीकत का मंजर मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में सामने आया है। यहां बेशकीमती सागौन की लकड़ी की तस्करी का एक ऐसा सिंडिकेट उजागर हुआ है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली और पुलिस की चौकसी पर गहरे सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। कोलकाता से बिना वैध दस्तावेजों के चली 19 लाख रुपये कीमत की सागौन की लकड़ी मऊगंज के रकरी गांव तक पहुँच गई और जिम्मेदार कुंभकर्णी नींद सोते रहे या फिर यूँ कहें कि ‘नींद’ का ढोंग करते रहे।

आधी रात का ‘ऑपरेशन’ और गायब हुआ ट्रक

इस पूरी साजिश की पटकथा 17 मार्च 2026 को लिखी गई, जब ट्रक क्रमांक PB 07 AS 8251 कोलकाता से बरेली (यूपी) के लिए रवाना हुआ। हैरान करने वाली बात यह है कि इस ट्रक के साथ एक काले शीशों वाली सफेद स्कॉर्पियो साये की तरह मऊगंज की सीमा से रकरी गांव तक साथ चलती रही। 18 और 19 मार्च की दरम्यानी रात करीब 3 बजे, मऊगंज थाना क्षेत्र के रकरी स्थित ‘चंदन ढाबा’ के पीछे हाइड्रा मशीन लगाकर ट्रक को आनन-फानन में खाली कर दिया गया। इसके बाद ट्रक चालक रासपाल सिंह वाहन लेकर प्रयागराज के नारीबारी पहुंच गया, ताकि लूट की झूठी कहानी गढ़ी जा सके।

 फॉरेस्ट ऑफिसर नयन तिवारी: रक्षक या तस्करी के सूत्रधार?

इस पूरे मामले में सबसे तीखा सवाल हनुमना रेंज के फॉरेस्ट ऑफिसर नयन तिवारी की भूमिका पर उठ रहा है। पुख्ता सूत्रों और चर्चाओं के अनुसार, जब ट्रक कोलकाता से निकला, तभी से नयन तिवारी लगातार तस्कर मोहम्मद शाहिद के संपर्क में थे। 19 मार्च को लकड़ी उतरने तक यह संवाद जारी रहा। और मोहम्मद शाहिद लगातार वाहन चालक रसपाल सिंह एवं तस्कर चंदन जायसवाल के संपर्क में था ! सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक जिम्मेदार वन अधिकारी का तस्करों से क्या और कैसा रिश्ता है? ट्रक हनुमना चेक पोस्ट पर करीब 2 घंटे खड़ा रहा, जहाँ वन विभाग के कर्मचारी मौजूद थे, फिर भी 19 लाख की सागौन ‘अदृश्य’ कैसे रही? क्या यह मान लिया जाए कि बाड़ ही खेत को खा रही है?

 कागजों की बाजीगरी: फर्जीवाड़े की बू

पुलिस की कार्यप्रणाली भी इस मामले में संदेह के घेरे में है। बिना दस्तावेजों की गहन पड़ताल किए आनन-फानन में मुकदमा दर्ज कर लिया गया, जबकि पेश किए गए कागज खुद अपनी पोल खोल रहे हैं। जब ट्रक 17 मार्च को निकला, तो टीपी (Transit Pass) 18 मार्च की कैसे बनी? और ई-वे बिल 19 मार्च की दोपहर का क्यों है? क्या पुलिस और वन विभाग ने इन तकनीकी विरोधाभासों को जानबूझकर नजरअंदाज किया? बाँस की लकड़ियों के नीचे छिपाकर लाई गई सागौन की यह खेप सीधे तौर पर एक बड़े संगठित अपराध की ओर इशारा कर रही है।

 साजिश का पर्दाफाश या फाइलों में दफन होगा मामला?

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक दिलीप सोनी ने दो आरक्षकों को लाइन अटैच कर दिया है और जांच की कमान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक विक्रम सिंह को सौंपी है। वर्तमान में ट्रक चालक रासपाल सिंह और मोहम्मद शाहिद पुलिस की गिरफ्त में हैं, लेकिन बड़ा सवाल अब भी जस का तस है। क्या मुख्य किरदारों तक कानून के हाथ पहुंचेंगे? क्या फॉरेस्ट ऑफिसर नयन तिवारी और मोहम्मद शाहिद के मोबाइल की सीडीआर और लोकेशन की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर रसूख के रस्ते यह मामला भी ठंडे बस्ते की भेंट चढ़ जाएगा? मऊगंज की जनता अब इस ‘सागौन कांड’ के असली मास्टरमाइंड के बेनकाब होने का इंतजार कर रही है।

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