संजीव शर्मा, कोंडागांव। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन बस्तर जैसे आदिवासी अंचल में हाईब्रिड खेती के बढ़ते चलन से पारंपरिक देसी धान की किस्में विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं. ऐसे में कोंडागांव के किसान शिवनाथ यादव और उनकी ‘धरोहर समिति’ ने उम्मीद की मजबूत मिसाल पेश की है. करीब 25 वर्षों की निरंतर मेहनत से शिवनाथ यादव ने धान की 290 देसी व विलुप्त होती किस्मों को सहेजा है, जबकि 44 किस्मों पर शोध अभी जारी है.

एक मकसद, एक आंदोलन

धरोहर समिति का उद्देश्य साफ है कि विलुप्त होती देसी धान की किस्मों को बचाना और किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर पारंपरिक देशी खेती के लिए प्रेरित करना है. इससे न केवल मिट्टी को बंजर होने से बचाया जा सकता है, बल्कि उसकी उर्वरता शक्ति भी बढ़ती है. बीते 25 वर्षों में समिति का यह प्रयास काफी हद तक सफल भी हुआ है. यह काम केवल बीज संग्रहण तक सीमित नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और किसानों के अधिकारों से जुड़ा एक व्यापक आंदोलन बन चुका है.

प्रेरणा से शुरुआत, ‘धरोहर’ की नींव

देसी बीजों के संरक्षण की प्रेरणा शिवनाथ यादव को मुंबई की स्वयंसेवी संस्था ‘रूरल कम्यूनस’ के संस्थापक स्व. मुन्नीर से मिली. इसी प्रेरणा के साथ वर्ष 1995 में कोंडागांव के गोलावंड में किसानों का समूह बनाकर ‘धरोहर समिति’ की स्थापना की गई. तब से लेकर आज तक यह समिति देसी बीजों के संरक्षण और संवर्धन में जुटी हुई है.

राष्ट्रीय पहचान और सम्मान

धरोहर समिति के उल्लेखनीय कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली. पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण, कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में धरोहर समिति को प्रशस्ति पत्र के साथ 10 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई.

बेचते नहीं, बांटते हैं बीज

धरोहर समिति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह बीजों का व्यापार नहीं करती. शिवनाथ यादव और उनका समूह बीजों की अदला-बदली करता है और किसानों को स्वयं बीज उत्पादन के लिए प्रेरित करता है. पारंपरिक ज्ञान के साथ कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से देसी किस्मों का संरक्षण किया जा रहा है.

रासायनिक खेती पर चिंता

शिवनाथ यादव बताते हैं,
“पहले किसान जमीन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग किस्म का धान बोते थे. गोबर की खाद और प्राकृतिक तरीकों से कीट नियंत्रण होता था. आज अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक खाद और दवाओं का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिसका असर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा है.”

पोषण भी, औषधि भी

देसी धान की कई किस्में पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर हैं.

  • काटा मैहर धान में प्राकृतिक रूप से आयरन पाए जाने की बात पारंपरिक ज्ञान में मिलती है.
  • इलायची आलचा जैसी किस्में औषधि के रूप में उपयोग की जाती रही हैं.

सुगंधित और विशेष किस्में

  • पतला श्रेणी: बादशाहभोग, लोकटी माछी
  • मोटा श्रेणी: दांदर, कुमड़ा फूल, कुकड़ी मुंही, अलसागार, बासमुही
  • अर्ली वैरायटी: भूरसी, लालू-14, धंगढ़ी काजर
    सहित कई किस्मों पर शोध जारी है.

जैविक खेती की नई संभावनाएं

आज देश-विदेश में ब्लैक राइस, रेड राइस और पोषक तत्वों से भरपूर देसी चावल की मांग लगातार बढ़ रही है. इससे बस्तर अंचल में जैविक खेती और किसानों की आय बढ़ाने की नई संभावनाएं बन रही हैं. शिवनाथ यादव का मानना है कि यदि देसी बीजों को संरक्षित कर बाजार से जोड़ा जाए, तो यह क्षेत्र आत्मनिर्भर कृषि की मिसाल बन सकता है.

विरासत को बचाने की जंग

धरोहर समिति का यह प्रयास सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता को बचाने की लड़ाई है. शिवनाथ यादव जैसे किसानों की मेहनत यह साबित करती है कि मजबूत संकल्प के साथ विलुप्त होती विरासत को फिर से जीवन दिया जा सकता है.