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आखिरी दलील पर हुआ ओबीसी आरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने जब आदेश देकर कहा कि ओबीसी आरक्षण के बगैर निकाय और पंचायत चुनाव किए जाएंगे तो हर दल इस आदेश के पालन को मजबूर हो गया। दोनों ही दल बुझे मन से तैयार हुए और मामला संभालने के लिए अपनी तरफ से ओबीसी को 27 फीसदी टिकट देने का ऐलान किया गया। सरकार की तरफ से मॉडिफिकेशन याचिका केवल औपचारिकता भर रह गई थी। लेकिन इसी औपचारिकता में ओबीसी आरक्षण के रूप में भागते भूत की लंगोटी हासिल हो ही गई। बीजेपी और कांग्रेस इसमें अपना क्रेडिट लेने की कोशिश कर रही है, जो सियासी लिहाज़ से लाजिमी भी है। लेकिन हकीकत यह है कि फैसले वाले दिन की आखिरी सुनवाई के दौरान एक सीनियर मोस्ट वकील ने एक ज़बरदस्त दलील दी। जिसके बाद ही 50 फीसदी आरक्षण की लिमिट में ओबीसी को एडजस्ट करने जैसा का फैसला आया। ये सीनियर मोस्ट वकील साहब अब तक सुनवाई में मौजूद नहीं थे, केवल आखिरी दिन की सुनवाई में इनका नाम जोड़ा गया। दिलचस्प तथ्य यह है कि ये वकील साहब सरकार की तरफ से खड़े नहीं किये गए थे। राज़ इसी बात में छिपा है कि वकील किसकी तरफ से खड़ा किया गया। जाहिर है, वकील जिसने खड़ा किया ओबीसी आरक्षण का क्रेडिट भी उसी को जाता है। आप भी खोजिए फैसले वाली कॉपी में वकील साहब का नाम।

जब रुक गई पंचायत चुनाव की फाइल

सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में चुनाव कराने के निर्देश दिए तो चुनाव आयोग पूरी तरह तैयार था। जो तैयारियां थीं उसके मुताबिक नगरीय निकायों के चुनाव सबसे पहले किया जाना संभव था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अमल के लिए पंचायत विभाग की तरफ से आरक्षण कार्यक्रम जारी करने का इंतज़ार था। दिन भर की जद्दोजहद के बाद अधिकारियों ने आरक्षण कार्यक्रम तैयार कर लिया। जिसके बाद चुनाव आयोग पंचायत चुनाव का ऐलान कर सकता था। सीक्रेट बात यह है कि अधिकारियों की दिन रात की मेहनत अचानक एक फोन के बाद ज़ाया हो गई। दरअसल, इस चुनाव कार्यक्रम को जारी करने से पहले रोक दिया गया था। तैयारियां इतनी दुरुस्त थी कि तारीखवार पूरा कार्यक्रम तय कर लिया गया था। तुरत-फुरत नोटशीट चलाकर औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं थी और आदेश पर जिम्मेदार अधिकारी के दस्तखत भी हो गए थे। केवल आरक्षण कार्यक्रम को जारी करना शेष था। लेकिन अचानक यह आदेश जारी करने से रोकने का फरमान आ गया। पूरे महकमे में इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि आदेश आखिर रोका क्यों गया। जबकि सरकार ने ओबीसी को 27 फीसदी टिकट देकर चुनाव कराने का मन बना लिया था। अब इस सवाल का जवाब भी खोजा जा रहा है कि चुनाव आयोग कह रहा था कि निकाय चुनाव पहले कराए जा सकते हैं और पंचायत चुनाव का ऐलान बाद में होगा। मौजूदा हालात यह हैं कि पंचायत चुनाव पहले कराया जा रहा है।

राष्ट्रीय कांग्रेसी नेता की परहेज़ पॉलिटिक्स

कांग्रेस के एक आदिवासी नेता जो राष्ट्रीय परिदृश्य पर लगातार धूम मचा रहे हैं। दिल्ली के निर्देश के बाद नेताजी झारखंड के बाद अब गुजरात में भी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। उनका ज्यादातर वक्त दिल्ली, गुजरात और झारखंड में ही बीत रहा है। बीते दिनों जयपुर की बैठक में भी वे सक्रिय नज़र आए। इसके बाद दिल्ली में गलबहियां बढ़ाईं गईं। लेकिन एमपी में वे आमतौर पर नदारद ही नज़र आते हैं। एमपी में वे अपने विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हैं, लेकिन भोपाल में वे पार्टी की बैठक और कार्यक्रमों से दूर ही नजर आते हैं। ऐसा नहीं है कि भोपाल आना नहीं होता, नेताजी आते तो हैं लेकिन व्यक्तिगत कामकाज निपटाकर फिर कूच कर जाते हैं। पार्टी में अब चर्चाएं चल पड़ी हैं कि जिस नेता की उपयोगिता झारखंड और गुजरात में महसूस की जा रही है, उसे एमपी में काम करने से लेकर परहेज़ क्यों? एमपी कांग्रेस में कमलनाथ आए दिन बैठक और रणनीति बनाते नजर आते हैं। इन बैठकों में पार्टी के दिग्गजों की मौजूदगी लगातार देखी जा रही है। लेकिन इस आदिवासी राष्ट्रीय नेता की लगातार गैरमौजूदगी अब शंका में डाल रही है। पार्टी के कई विधायकों के दलबदल के बाद सरकार गंवानी वाली कांग्रेस में इस तरह की नज़रअंदाज़ी से नेताओं के बीच तरह-तरह की बातें शुरू होने लगी है। आपको ये ज़रूर बता दें कि नेताजी अपनी ही पार्टी के एक पूर्व मुख्यमंत्री के साथ रिश्तों को लेकर ज्यादा सुर्खियां बटोरते हैं।

बीजेपी में फूल की दुकान का पतझड़

कमल के फूल वाली पार्टी के प्रदेश दफ्तर में फूल की दुकान का पतझड़ चल रहा है। चंद रोज़ पहले तक पार्टी के हर आमो-खास कार्यक्रम को करीने से सजाने वाले इस पार्टी कार्यकर्ता पर जिम्मेदार पद पर बैठे युवा ने वक्रदृष्टि डाल दी है। नतीजतन पुराने कार्यकर्ता की सक्रियता कम हो गई है। मामला सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भड़ास निकालने तक पहुंच गया है। दोनों ओर से ऐसे इशारे किए जा रहे हैं कि कई लोग मुंह दबाकर चटखारे ले रहे हैं। पीढ़ी बदल के दौर से गुजर रही प्रदेश बीजेपी में अदावत का यह नयी अदा पार्टी की नीति-रीतियों पर भी सवाल खड़ा कर रही है। जो पुराने सक्रिय कार्यकर्ता नई पीढ़ी के आगमन की वजह से दरकिनार हो रहे हैं, वे नयी पीढ़ी से जिल्लत का सामना भी कर रहे हैं। दरअसल, नई टीम की वजह से पुरानी टीम हाशिये पर तो पहुंच गई है। पुरानी टीम के साथ काम करने वाले कई सपोर्टिंग किरदार भी गायब हो गए हैं और उनकी जगह नए किरदार खड़े किए जा रहे हैं। लिहाज़ा आने वाले दिनों में पार्टी कार्यक्रमों में नई खुशबू, नया कलेवर और नए फूल कारोबारी की साज सज्जा देखने को मिल सकती है। सनद रहे, ये पतझड़ का मौसम केवल संगठन तक सीमित है, सरकार की बगिया में पुराने फूलों की बहार है।

बीजेपी के बूथ विस्तारक का पासवर्ड

बीजेपी के बूथ विस्तारक योजना को लेकर प्रदेश भर से इकट्ठा किया गया मटेरियल जहां स्टोर किया गया था। वह विंडो अब खुल नहीं रहा है। इसे लेकर भारी जद्दोजहद पिछले कई दिनों से चल रही है। दिन रात एक करके विंडो खोलने की कोशिश की जा रही है। तमाम आईटी एक्सपर्ट को पासवर्ड क्रेक करने में लगा दिया गया लेकिन बीजेपी जैसी तगड़ी व्यवस्था का पासवर्ड क्रेक ही नहीं हो पा रहा है। दरअसल, इस जिम्मेदारी को निभाने वाला एक आउटसोर्स कर्मचारी अचानक काम छोड़कर चला गया है। पार्टी के जिम्मेदार लोगों ने संपर्क करने की लाख कोशिशें की लेकिन कर्मचारी गायब है। फोन किया, घर छान मारा दोस्तों यारों तक के फोन घनघना दिए, लेकिन हर जगह असफलता हाथ लगी है। पार्टी की अहम योजना की महत्वपूर्ण जानकारी के लिए पसीना बहाने वालों के होश अब फाख्ता हो रहे हैं। सबकुछ पास होने के बावजूद भी हाथ खाली हैं। हालत यह है कि गायब हैं के पोस्टर भर नहीं लगाए गए हैं। एक बार तो पुलिस में रिपोर्ट करने की चर्चा भी हुई, लेकिन फिलहाल ये प्लान टाल दिया गया कि पार्टी की फजीहत हो जाएगी। फिलहाल तलाश जारी है। किसी को खबर हो तो पार्टी कार्यालय संपर्क करें। मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है।

दुमछल्ला…

गुना सांसद केपी यादव और गुना में सिंधिया के समर्थकों के बीच विवाद गहराता जा रहा है। किसी भी वक्त लड़ाई ज़मीन परआ सकती है। दोनों ओर से मोर्चा खोल दिया गया है। हालत यह है कि अब पार्टी दफ्तर ने भी धर्मसंकट की स्थिति में फंसकर मामले से किनारा करना शुरू कर दिया है। इस मामले में पार्टी की तरफ से बयान देने से भी इनकार किया जा रहा है। उधर, गुना में चिंगारी को लगातार हवा दी जा रही है। लोकल सूत्तारों का कहना है कि एक गुट तो विस्फोट की तैयारी में है। दोनों ओर से जिस तरह मोर्चा खोला गया है मामला अब दिल्ली पहुंचा दिया गया है। दिल्ली की इंटेलीजेंस ने मामले को मोदी-शाह की टेबल पर सरका दिया है। आप भी आने वाले दिनों में किसी अपडेट की प्रतीक्षा कीजिए।

(संदीप भम्मरकर की कलम से)

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