Udaipur Menar Holi 2026: राजस्थान के उदयपुर जिले से करीब 45 किलोमीटर दूर चित्तौड़गढ़ हाईवे पर स्थित मेनार गांव एक बार फिर इतिहास के पन्नों को जीवंत करने के लिए तैयार है। होली के त्यौहार पर जहाँ पूरा देश रंगों और गुलाल में डूबा रहता है, वहीं मेनार में रंगों के बजाय बारूद और बंदूकों से होली खेली जाती है।
शौर्य और पराक्रम का यह अनूठा उत्सव 4 मार्च 2026 को चैत्र कृष्ण द्वितीया यानी जमरा बीज के अवसर पर मनाया जाएगा। यह परंपरा केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि मेवाड़ की रक्षा के लिए मेनारिया ब्राह्मणों द्वारा मुगलों पर हासिल की गई ऐतिहासिक विजय का प्रतीक है, जिसे ग्रामीण पिछले 500 वर्षों से अटूट श्रद्धा के साथ निभाते आ रहे हैं।

इस बारूद की होली के पीछे महाराणा अमर सिंह के शासनकाल की एक वीरतापूर्ण गाथा छिपी है। उस समय मेवाड़ की पावन धरा पर मुगलों ने जगह-जगह अपनी सैनिक छावनियां बना रखी थीं और मेनार के पूर्व दिशा में स्थित मुगल छावनी के आतंक से स्थानीय ग्रामीण त्रस्त थे। जब मेनारवासियों को वल्लभनगर छावनी पर विजय का समाचार मिला, तो उन्होंने अपनी धरती को मुक्त कराने के लिए एक गुप्त योजना बनाई। विक्रम संवत 1657 में ग्रामीणों ने मुगलों को चकमा देने के लिए कूटनीति का सहारा लिया और उन्हें होली खेलने के बहाने आमंत्रित किया। जमरा बीज की रात जब मुगल सैनिक बेखौफ होकर गैर नृत्य देख रहे थे, तभी ओंकारेश्वर चबूतरे से बजने वाले ढोल की थाप अचानक रणभेरी में बदल गई। नंगी तलवारों और ढालों के साथ मेनारिया ब्राह्मणों ने मुगलों पर धावा बोल दिया और पूरी छावनी को तहस-नहस कर मेवाड़ को आतंक से मुक्त कराया।
धधकते बारूद और तोपों की गर्जन का रोमांच

उत्सव की शुरुआत जमरा बीज की सुबह ओंकारेश्वर चबूतरे पर लाल जाजम बिछाकर अमल कसूंबे की रस्म के साथ होती है। पूरे दिन गांव में उत्सव का माहौल रहता है और मेहमानों का स्वागत पारंपरिक भोजन से किया जाता है। असली रोमांच शाम ढलने के बाद शुरू होता है जब गांव के युवा युद्ध की वेशभूषा में तैयार होते हैं। सफेद धोती-कुर्ता और कसूमल पाग (लाल पगड़ी) पहने ग्रामीणों के पांच दल अलग-अलग रास्तों से चारभुजा मंदिर के चौराहे पर इकट्ठा होते हैं। जैसे ही फेरावत का इशारा मिलता है, पूरा गांव बंदूकों की कड़कड़ाहट और तोपों की गर्जन से गूँज उठता है। आसमान में चारों तरफ आग की लपटें और बारूद की रोशनी दिखाई देती है। खास बात यह है कि इस दौरान हजारों की संख्या में हवाई फायर किए जाते हैं और तलवारों से गैर नृत्य होता है, लेकिन आज तक इस आयोजन में किसी को कोई चोट नहीं आई है।
आत्मनिर्भर सुरक्षा और भविष्य की तैयारी
मेनार के इस ऐतिहासिक आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्व-अनुशासन है। यहाँ सुरक्षा के लिए पुलिस जाप्ते या प्रशासनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पड़ती। ग्रामीण युवा स्वयं ही पूरी व्यवस्था संभालते हैं और हर कार्य को अपने घर का दायित्व समझकर पूरा करते हैं। 4 मार्च की आधी रात तक चलने वाला यह उत्सव न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के शौर्य से परिचित कराने का एक सशक्त माध्यम भी है। इस वर्ष भी भारी संख्या में लोगों के जुटने की उम्मीद है, जिसके लिए ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है।
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