देहरादून. पूर्व सीएम हरीश रावत ने उत्तराखंड के परिवेश औऱ अस्तित्व को लेकर चिंता व्यक्त की है. उनका कहना है कि प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन और लोगों में असहिष्णुता का भाव बढ़ रहा है. हरीश रावत ने कहा, हिमालयी सोच, उत्तराखंड की पहचान. राज्य निर्माण के संघर्ष से लेकर राज्य के अस्तित्व में आने तक की प्रक्रिया में हमेशा हिमालयी परिवेश और हिमालयी सोच आदि रही हैं. राज्य बनने के बाद हम धीरे-धीरे फिर से उसी सोच पर काम करने लगे जिस सोच के आधार पर हम उत्तरप्रदेश का हिस्सा थे और जिस सोच से अलग होने के लिए उत्तराखंड राज्य निर्माण की आवाज़ उठी.

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हरीश रावत ने ये भी कहा कि 2014 में जब मुझे अवसर मिला तो मैंने इस अंतर महसूस किया कि हम उत्तर प्रदेश की या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की फोटोकॉपी के बजाय अपने हिमालयी परिवेश के साथ हिमालय की सोच को आगे बढ़ाएं और उस सोच का राज्य बनाएं और इसीलिए हमने हजारों-हजार छोटी-मोटी सारी पहलों के जरिए कुछ इस तरीके की नीतियां, कार्यक्रम आदि क्रियान्वित किए ताकि हिमालयी परिवेश भी मजबूत हो, हिमालयी संस्कृति भी मजबूत हो और हिमालयी सोच भी मजबूत और हम अपने अस्तित्व के साथ न्याय कर सकें और उस समझ के साथ न्याय कर सकें, जिस समझ के साथ भारत की संसद ने हमको हिमालयी राज्य के रूप में अस्तित्व प्रदान करने का काम किया.

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आगे उन्होंने कहा, आज इस बात का कष्ट है कि 2017 तक सब ठीक चल रहा था, लेकिन 2017 में हमारी सरकार की पराजय के बाद फिर से हम पुराने ही ढर्रे पर चले जा रहे हैं. फिर से हम उत्तरप्रदेश के फोटो कॉपी बन रहे हैं, न कि अपने को एक हिमालयी राज्य के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं. यही कारण है कि आज राज्य अपने अस्तित्व की समस्याओं के साथ जूझ रहा है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती आज पलायन और बढ़ती बेरोजगारी है, एक असंतुलित विकास है, एक असहिष्णुता का भाव धीरे धीरे भाव है और परिवेश धीरे-धीरे डेकोरेट हो रहा है. परिवेश में कई तरीके की भ्रांतियां पैदा हुई है तो इस स्थिति से हमको उभरना है तो हमको फिर से 2014 से 2017 के जिस मॉडल को हमने प्रतिपादित करने का काम किया, हमारी सरकार ने प्रतिपादित करने का काम किया, उसी रास्ते पर आकर के राज्य को खड़ा करना पड़ेगा अन्यथा हम फिर पछताएंगे.