देहरादून. पूर्व सीएम हरीश रावत ने प्रदेश के संस्कृति और व्यंजन से आने वाली पीढ़ी को परिचित करवाने के लिए प्रदेशवासियों से खास अपील की है. उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट कर कहा, मैं कोई फूड ब्लॉगर नहीं हूं. उत्तराखंड के व्यंजन हमारी संस्कृति और हमारे परिवेश की सौगातें हैं. उन सौगातों से आने वाली पीढ़ी को परिचित करवाना और अवगत कराना हम सबका कर्तव्य है. इस लड़ाई में आप सब भी जुटें, मैं आप सबका भी आवाहन करता हूं.

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आगे उन्होंने कहा, उत्तराखंड ने मुझे नाम दिया, एक प्रसिद्धि दी. यदि उस नाम और प्रसिद्धि का थोड़ा हिस्सा मैं वहां के व्यंजनों के प्रचार-प्रसार के लिए कर सकता हूं, वहां के जो खान-पान हैं और जो जैविक उत्पाद हैं, उनके प्रचार-प्रसार के लिए कर सकता हूं, तो इसका अर्थ है कि मैं अपने कर्तव्य को ठीक से समझा हूं और उस कर्तव्य का पालन कर रहा हूं. बल्कि मैं तो चाहूंगा कि हमारे और भी बहुत से नामचीन उत्तराखंड के लोग हैं, यदि वे एक-दो व्यंजनों को भी अपना प्रिय बनाकर उसका प्रचार-प्रसार कर दें, तो राष्ट्रीय व्यंजनों की थाली में उत्तराखंड के व्यंजनों का सम्मान स्थापित हो जाएगा. कितनी अजीब सी विडंबना है कि जिस राज्य में जनसंख्या के घनत्व के हिसाब से सबसे ज्यादा शेफ हैं, आप दुनिया भर के बड़े-बड़े होटलों में देखिए तो उनमें काम करने वाला कोई न कोई उत्तराखंडी आपको जरूर मिल जाएगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों की थाली तो छोड़ दीजिए, राष्ट्रीय व्यंजनों की थाली में भी हमारा कोई व्यंजन अपना स्थान नहीं बना पाया है.

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आगे हरीश रावत ने कहा, हमारे यहां केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर में गुजरात का समोसा मिल जाएगा, वहां पंजाब के छोले-भटूरे मिल जाएंगे, वहां केरल का रसम-भात मिल जाएगा, वहां आपको महाराष्ट्र की पाव-भाजी मिल जाएगी, लेकिन उत्तराखंड की बेड़ू रोटी या भरवा रोटी नहीं मिल पाएगी, क्योंकि हमने उस दिशा में प्रयास नहीं किया है और मैं उस दिशा में प्रयास करना अपना कर्तव्य मानता हूं. मैं समझता हूं कि मेरे मित्र इसको सही दिशा में समझने का प्रयास करेंगे. यह कोई फूड ब्लॉगिंग नहीं है, बल्कि यह अपने व्यंजनों को स्थापित करने की एक बड़ी लड़ाई है.