देहरादून. पूर्व सीएम हरीश रावत ने पलायन के मुद्दे पर धामी सरकार पर करारा हमला बोला है. हरीश रावत ने कहा, सीमांत बचेगा तो ही उत्तराखंड सशक्त रहेगा! पलायन एक महाप्रकोप बनने जा रहा है. अभी कुछ समय पहले तक जो हमारे सीमांत जनपद हैं, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग में पलायन की गति या तो नाम मात्र की थी या बहुत नियंत्रित थी, लेकिन जब मैं इस बार तल्ला जोहार गया तो वहां लोगों ने बढ़ते हुए पलायन की शिकायत की और यही शिकायत पिछली बार कपकोट भ्रमण के दौरान भी मिली.

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आगे हरीश रावत ने कहा, पहले इन क्षेत्रों के लोग केवल फौज में जाते थे या सरकारी सेवाओं में जाते थे और अपनी खेती-बाड़ी करते थे. हमारी सरकार ने इन जनपदों को सीमांत क्षेत्रों के विकास के प्रशासनिक मॉडल के रूप में विकसित किया. इन जनपदों में जितने विकासखंड नहीं हैं, उससे अधिक तहसीलें और उप तहसीलें खोली गईं तथा यहां आईटीआई, पॉलिटेक्निक, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज और स्पोर्ट्स कॉलेज खोले गए. हमने बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए इन क्षेत्रों के ग्रामीण अंचलों में डिग्री कॉलेजेज खोले और आज इन डिग्री कॉलेजों में हमारी बेटियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं.

आगे उन्होंने कहा, हमने यहां सड़कों के साथ स्थानीय उत्पादों को मंडी के साथ जोड़ने और उत्पादों को उच्चीकृत करने के लिए आवश्यक साज-सज्जा युक्त कार्यशालाएं खोलीं. चाहे वह डुंडा में हो, चाहे जोशीमठ हो, चाहे मुनस्यारी हो, चाहे चमोली हो, लेकिन कहीं न कहीं इन 8-9 वर्षों में विकास की दिशा भटक गई है और यही कारण है कि इस क्षेत्र में भी पलायन की गति बढ़ रही है. यह सब सीमांत क्षेत्र हैं, सीमांत क्षेत्रों का पलायन केवल वाइब्रेंट विलेज कहने से नहीं रुकेगा.

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हरीश रावत ने आगे कहा, वाइब्रेंट विलेज तो आप ऐसा बनाते हैं, उसका मॉडल हम गुंजी में देख रहे हैं, जहां लोगों की जमीनें आप पर्यटन विकास के नाम पर हड़प रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि हम अपने पर्यटन हाउसेज बनाएंगे, लेकिन आप उन पर अपने पर्यटन का मॉडल थोप रहे हैं और मुझे यह जानकर तकलीफ हुई कि हमारे समय में जो सीमांत विकास विभाग था, अब उसको भी लगभग निष्क्रिय कर दिया गया है. मतलब कोई मंच ऐसा नहीं है, जिसमें सीमांत क्षेत्र के लिए सोच उजागर हो सके. धन्य है नारेबाज भाजपा, किसी को नहीं छोड़ा तुमने.