गोविंद पटेल, कुशीनगर। सरकार भले ही भूमाफियाओं के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और सख्त कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे करती रही हो, लेकिन कुशीनगर से सामने आया यह मामला उन तमाम दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। जनपद में ऐतिहासिक राजदरबार से जुड़े एक ट्रस्ट की करीब 709 एकड़ बेशकीमती जमीन पर न सिर्फ कागजी हेराफेरी की गई, बल्कि खुलेआम कब्जा, खेती, बिक्री और पक्के निर्माण तक कर दिए गए।
रानी रेवती देवी–रवि प्रताप न्यास के नाम दर्ज
हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ न्यायालय के आदेश और प्रशासनिक संरक्षण के बावजूद होता रहा। मामला पडरौना स्थित ऐतिहासिक राजदरबार से जुड़ा है। यह भूमि रानी रेवती देवी–रवि प्रताप न्यास के नाम दर्ज है। रानी रेवती देवी ने अपनी संपूर्ण संपत्ति ट्रस्ट को समर्पित कर दी थी। कानून के अनुसार न्यास की संपत्तियों पर ट्रस्ट का पूर्ण अधिकार है और वह उनका प्रतिनिधित्व व संरक्षण करने का अधिकारी है। इसके बावजूद आरोप है कि कुछ भ्रष्ट चकबंदी और राजस्व अधिकारियों ने “सीरदार” शब्द का दुरुपयोग करते हुए भूमाफियाओं के नाम फर्जी तरीके से खतौनी में प्रविष्टियां करा दी।
709 एकड़ भूमि का रिसीवर नियुक्त
इस गंभीर मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उच्च न्यायालय ने 195 लोगों के खिलाफ नोटिस जारी किया था। साथ ही हाईकोर्ट के निर्देश पर जिलाधिकारी कुशीनगर को 709 एकड़ भूमि का रिसीवर नियुक्त किया गया। बावजूद इसके, जमीन पर कब्जा, फसल बोना, बिक्री और निर्माण का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। सवाल उठता है कि जब भूमि प्रशासन के संरक्षण में थी, तो उसकी खुलेआम खरीद–फरोख्त और अवैध कॉलोनियों का निर्माण कैसे हुआ?
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राजदरबार पक्ष के पैरोकार मोतीलाल गुप्ता का आरोप है कि पडरौना और खड्डा तहसील क्षेत्र की जमीनों में बड़े पैमाने पर कागजी हेराफेरी कर बिक्री की गई। पडरौना तहसील के जंगल बेलवा क्षेत्र में अराजी संख्या 604, रकबा 5.3140 हेक्टेयर पर पूरी की पूरी कॉलोनी बसा दी गई, जहां आज 100 से अधिक लोग मकान बनाकर रह रहे हैं। डीएम स्तर की जांच में फर्जीवाड़ा उजागर होने के बाद खरीदारों में हड़कंप मच गया और अब उन्हें ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का डर सता रहा है। खड्डा तहसील में भी राजदरबार की सिलिंग भूमि पर अभिलेखों में हेराफेरी कर नाम दर्ज कराने के आरोप सामने आए हैं।
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जांच में कई सफेदपोशों और राजस्वकर्मियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। डीएम की जांच के बाद कोतवाली पुलिस ने नौ आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी और कूटरचना की एफआईआर दर्ज की है। मुकदमा दर्ज होते ही आरोपी फरार हो गए। चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि वर्ष 2001 के अंतिम सिलिंग आदेश के अनुसार भूमि स्वामी का नाम आज भी राजस्व अभिलेखों में दर्ज है, इसके बावजूद 28 सितंबर 2025 को अवैध रूप से विक्रय विलेख करा दिया गया।
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यह पूरा मामला एक संगठित भूमाफिया गिरोह और सरकारी तंत्र की मिलीभगत की ओर इशारा करता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है,क्या प्रशासन सिर्फ एफआईआर तक सीमित रहेगा या फिर 709 एकड़ जमीन को मुक्त कराकर दोषियों को सख्त सजा दिलाई जाएगी? कुशीनगर का यह मामला शासन-प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा बन चुका है।
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