गोविंद पटेल, कुशीनगर. योगी सरकार यूपी में चौतरफा विकास का दावा करती है. लेकिन दावे केवल कागजी और जुबानी है, जिनका हकीकत से कोई लेना देना नहीं है. सरकार के तमाम दावे सफेद झूठ साबित हो रहे हैं. आलम ये है कि गंडक नदी पर बना पुल बदहाली के आंसू बहा रहा है, लेकिन जिम्मेदार हैं कि गहरी नींद में नजर आ रहे हैं. हर रोज हजारों लोग अपनी जान जोखिम में डालकर नाव से नदी को पार कर रहे हैं. ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि क्या किसी की बलि चढ़ने के बाद ही सरकार और उसका सिस्टम नींद से जागेगा?

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बता दें कि जनपद के खड्डा तहसील क्षेत्र में बड़ी गंडक नदी पर करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित पीपा पुल आज भी आम जनता के लिए उपयोगी साबित नहीं हो पाया है. लगभग 15 से 20 हजार की आबादी, जो नदी के उस पार निवास करती है, आज भी बुनियादी आवागमन सुविधा के लिए संघर्ष कर रही है. हालात ऐसे हैं कि लोग अपनी जान जोखिम में डालकर नाव के सहारे नदी पार करने को विवश हैं. भैसहा घाट पर बने इस पीपा पुल का उद्घाटन करीब पांच वर्ष पूर्व बड़े धूमधाम और सरकारी तामझाम के साथ किया गया था. उस समय इसे क्षेत्रीय विकास की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया था.

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स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि इससे उनकी वर्षों पुरानी समस्या का समाधान हो जाएगा और आवागमन सुगम हो जाएगा. लेकिन हकीकत में यह पुल अब तक पूरी तरह चालू नहीं हो पाया है और अधिकतर समय बंद ही रहता है. ग्रामीणों के अनुसार, यह पुल केवल दिखावे तक सीमित रह गया है. जब भी नदी में पानी का स्तर बढ़ता है, पुल को खोल दिया जाता है और फिर लंबे समय तक उसे पुनः चालू नहीं किया जाता. ऐसे में लोगों को मजबूरी में प्राइवेट नावों का सहारा लेना पड़ता है. बड़ी गंडक नदी का तेज बहाव इस यात्रा को बेहद खतरनाक बना देता है. कई बार नाव अनियंत्रित हो जाती है, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि नावों पर सुरक्षा के कोई ठोस इंतजाम नहीं होते. यदि यह पुल सुचारू रूप से चालू हो जाए, तो भैसहा घाट के रास्ते खड्डा तक की दूरी मात्र 10 किलोमीटर रह जाएगी, लेकिन वर्तमान स्थिति में लोगों को बिहार के नौरंगिया होते हुए पनियहवा पुल से होकर लगभग 40 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है.

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स्थानीय निवासियों का आरोप है कि यह परियोजना सरकारी धन के दुरुपयोग का उदाहरण बनकर रह गई है. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आम जनता को इसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है. जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजी आंकड़ों में योजनाओं को सफल दिखाकर अपनी पीठ थपथपाने में लगे हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. जब इस संबंध में पीडब्ल्यूडी के संबंधित इंजीनियरों से बात करने का प्रयास किया गया, तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. वहीं उच्च अधिकारी न तो फोन उठाते हैं और न ही कार्यालय में उपलब्ध रहते हैं. इससे प्रशासनिक उदासीनता साफ झलकती है. अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक क्षेत्रीय जनता इस तरह की समस्याओं से जूझती रहेगी. क्या सरकार की योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगी या फिर धरातल पर भी उनका लाभ मिलेगा?