गोविंद पटेल, कुशीनगर. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलकर जब ‘जी रामजी’ किया गया, तो सरकार की ओर से बड़े बदलाव के दावे किए गए. ज़िला-ज़िला प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह भरोसा दिलाया गया कि अब मजदूरों को काम मिलेगा, समय से भुगतान होगा और व्यवस्था पारदर्शी बनेगी, लेकिन कुशीनगर ज़िले से सामने आ रही जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है.

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तमकुहीराज विकास खंड के लछिया देवरिया गांव में पिच सड़क से जेपी गुप्ता से बसडीला सिवान तक चकरोड पर मिट्टी कार्य दर्शाया गया है. रिकॉर्ड के मुताबिक यहां रोजाना 64 मजदूरों की हाजिरी मस्टरोल में दर्ज की जा रही है, लेकिन मौके पर न तो मजदूर दिखते हैं और न ही कोई कार्य होता नजर आता है. चकरोड पर मिट्टी कार्य सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है. ग्रामीणों का आरोप है कि जिन मजदूरों के नाम पर हाजिरी लग रही है, वे कभी भी कार्यस्थल पर जाते ही नहीं. कुछ ऐसे नाम भी मस्टर रोल में दर्ज हैं, जो लंबे समय से काम पर नहीं आए. इसके बावजूद उनकी नियमित उपस्थिति दिखाकर कागजी खानापूर्ति की जा रही है. इससे साफ है कि योजना का लाभ जरूरतमंद मजदूरों तक पहुंचने के बजाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है. नाम बदलने के बावजूद योजना की कार्यप्रणाली में कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आ रहा.

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ग्रामीणों का कहना है कि पहले मनरेगा में जो हालात थे, वही स्थिति अब ‘जी रामजी’ योजना में भी बनी हुई है. न काम, न पारदर्शिता और न ही जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई. इस संबंध में जब खंड विकास अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही. हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि जांच के नाम पर अक्सर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और कुछ दिनों बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ‘जी रामजी’ योजना सच में बदलाव लाएगी या फिर यह भी सिर्फ नाम बदलने तक सीमित रह जाएगी? फिलहाल तो हालात देखकर यही लगता है कि यह योजना भी “ढाक के तीन पात” वाली कहावत को ही चरितार्थ कर रही है.