लखनऊ. यूपी की सियासत में शंकराचार्य का मुद्दा गरमाया हुआ है. पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार जुबानी जंग जारी है. एक बार फिर अखिलेश यादव ने सीएम योगी के भाषा को तंज कसा है. साथ ही उनके योगी होने की योग्यता पर भी सवाल खड़े किए हैं. इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने तो सीएम योगी की तुलना सियार से तक कर डाली.
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अखिलेश यादव ने कहा, गुरु समान शंकराचार्य से सर्टिफिकेट की मांग. माता समान वयोवृद्ध महिला को सदन में अभद्र शब्द से संबोधित किया. अपने से बड़े, सदन के सदस्य को लठैत. CM यानी “करप्ट माउथ” ने नैतिकता और शिष्टाचार के सारे आयाम तोड़ दिए हैं, इसलिए बुद्ध काल की यह कथा बताना अत्यंत आवश्यक हो जाता है. आपने शायद जातक कथा के नीले सियार की कहानी सुनी होगी. एक सियार नील के टब में गिरकर नीला हो जाता है. उसके नीले रंग के कारण जंगल के अन्य जानवर उसे भगवान का दूत मानकर जंगल का राजा बना देते हैं. यह सियार राजा ज़रूर था, पर अपनी भाषा नहीं भूला था. समय बीतने पर जब उसने अन्य सियारों की हुआँ-हुआँ सुनी, तो वह खुद भी हुआँकने लगा, तभी सब जान गए कि वह सियार ही है और उसका छल खुल गया. आज के सीएम भी वही हैं.
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आगे उन्होंने कहा, जिन्हें “करप्ट माउथ” का इतिहास न पता हो, उनके लिए यह दबाई गई जानकारी- मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1994 के आसपास अजय सिंह बिष्ट अपने पारिवारिक परिवहन व्यवसाय में सहयोग कर रहे थे. उस समय उनके पास तीन बसें और एक ट्रक थे. उन्होंने यह सड़कछाप भाषा उसी समय, डग्गामार वाहन चलवाते समय ही सीखी थी. योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट और गोरखनाथ मठ के पूर्व महंत अवैद्यनाथ (कृपाल सिंह बिष्ट) आपस में रिश्ते में भाई थे. बताया जाता है कि बाद में उनके चाचा ने ही उन्हें मठ में बुलाया. महंत अवैद्यनाथ ने अपने भतीजे अजय सिंह बिष्ट को कुछ ही वर्षों में मठ का उत्तराधिकारी बना दिया. अजय सिंह बिष्ट गोरखनाथ पीठ के माध्यम से योगी आदित्यनाथ बने, जबकि इस पीठ में हजारों संन्यासी मौजूद थे.
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अखिलेश यादव ने ये भी कहा कि सवाल उठता है कि उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं को क्यों चुना गया – क्या यह केवल योग्यता का निर्णय था या रिश्तेदारी का भी प्रभाव था. पहले उन्हें मठ की गद्दी सौंपी गई और कुछ ही वर्षों में लोकसभा की सीट भी दे दी गई. क्या मठ में महंत चुनने के लिए कोई औपचारिक चुनाव प्रक्रिया हुई थी? क्या 4 साल में डग्गामार चलवाने वाला योगी का सर्टिफिकेट कैसे पा सकता है? यदि नहीं, तो क्या इसे “भगवा परिवारवाद” कहा जा सकता है? और अंत में – पद और परिधान तो रिश्तों और समय की मदद से मिल सकते हैं, पर भाषा और व्यवहार नहीं.
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