रविंद्र कुमार भारद्वाज, रायबरेली। उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में गंगा तट पर बसा डलमऊ एक ऐतिहासिक नगर है। यहां होली का त्योहार पूरे देश की तरह रंग-गुलाल, ढोल-नगाड़ों और उल्लास से नहीं मनाया जाता। बल्कि, होली के दिन और उसके बाद तीन दिन का सूतक मनाया जाता है। उसके बाद ही क्षेत्र के लोग सादगी से होली खेलते हैं। यह परंपरा लगभग 600-700 वर्ष पुरानी है, जो स्थानीय राजा डलदेव की वीर शहादत से जुड़ी हुई है।

ऐतिहासिक घटना और राजा डलदेव की शहादत

14वीं-15वीं शताब्दी (लगभग 1321 से 1421 ईस्वी के बीच, मुख्य रूप से 1402-1440 के दौरान) डलमऊ के शासक राजा डलदेव एक प्रजावत्सल, वीर और जनप्रिय राजा थे। उन्हें सूर्यवंशी, भारशिव, पासी या राजभर परंपरा का प्रमुख शासक माना जाता है। उनका राज्य गंगा और सई नदियों के बीच फैला था, जहां डलमऊ किला उनकी मजबूत राजधानी था। राजा डलदेव ने स्थानीय भर, बैस राजपूत, पासी, अहीर आदि समुदायों को एकजुट कर जौनपुर सल्तनत के शासक इब्राहिम शाह शर्की के आक्रमणों का बार-बार मुकाबला किया।शर्की राजा की बढ़ती ताकत से चिंतित थे।

डलमऊ किले पर किया था आक्रमण

होली के दिन शर्की की सेना ने डलमऊ किले पर आक्रमण किया। पखरौली गांव के निकट भीषण युद्ध हुआ। राजा डलदेव अपने भाइयों (बालदेव, ककोरन आदि) और सीमित सैनिकों के साथ निहत्थे होकर लड़े। कुछ लोककथाओं में राजा का धड़ एक हफ्ते तक लड़ता रहा जैसी अतिशयोक्ति भी है। राजा डलदेव और उनके साथी वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के बाद क्षेत्र में जौहर की घटनाएं भी हुईं। इस दुखद घटना ने पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया।

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परंपरा का जन्म और आज का रूप

राजा की शहादत के बाद लोगों ने होली के दिन शोक मनाने का संकल्प लिया। शास्त्रों में मृत्यु पर तीन दिन का सूतक मनाने का विधान है, इसलिए डलमऊ ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले 28 गांवों/मजरों में होली के दिन रंग-गुलाल नहीं उड़ता। लोग गमगीन रहते हैं, उत्सव टाल देते हैं। तीन दिन बाद सादगी से होली मनाई जाती है। इनमें शामिल प्रमुख गांव: पूरे वल्ली, नेवाजगंज, पूरे बघेलन, पूरे गुलाब राय, पूरे जोधी, नाथखेड़ा, पूरे बिंदा भगत, पूरे रेवती सिंह, अंबहा, बबुरा, मुराई बाग, देवली, पूरे लालता, पूरे कोयली, मोहदीनपुर, आफताब नगर, मखदुमपुर, बलभद्रपुर, पूरे शेखन, मुर्शिदाबाद, दरबानीहार, पूरे चौपदारन, सदलापुर, भीमगंज आदि।

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सांस्कृतिक महत्व और वर्तमान

यह परंपरा आज भी जीवित है। सावन में राजा डलदेव की स्मृति में मेला लगता है, उनकी प्रतिमा पूजनीय है। स्वामी दिव्यानंद जैसे विद्वान इसे शास्त्रीय बताते हैं। होली हर्ष-उल्लास का पर्व है, लेकिन यहां यह राजा के बलिदान की याद दिलाता है। डलमऊ के लोग सदियों से अपने पूर्वजों की वीरता और शहादत को सम्मान देते हैं। यह अनोखी परंपरा क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है, जो बताती है कि कैसे एक ऐतिहासिक घटना त्योहारों को भी प्रभावित कर सकती है।